व्लादिमीर पुतिन और नरेन्द्र मोदी, फोटो (सो, सोशल मीडिया) 
विदेश

Explainer: क्या भारत में अब तैनात होंगे रूसी सैनिक? समझिए पुतिन-मोदी के बीच हुई इस 'सुपर डील' के असल मायने

India Russia RELOS Military Pact: भारत-रूस के बीच 'RELOS' समझौता प्रभावी हो गया है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और एयरफील्ड का उपयोग कर सकेंगे। जानिए इसका क्या होगा असर?

अमन उपाध्याय

India Russia RELOS Military Pact Defense Agreement Explained: दुनिया में उथल-पुथल और बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत और रूस ने अपनी दशकों पुरानी दोस्ती को एक नए और बेहद शक्तिशाली स्तर पर पहुंचा दिया है। दुनिया की दो सबसे बड़ी सेनाओं ने 'रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट' (RELOS) समझौते को न केवल अंतिम रूप दिया है बल्कि अब यह आधिकारिक रूप से प्रभावी भी हो गया है। इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी विदेशी सेना को भारतीय सरजमीं पर तैनात होने की अनुमति देता है।

क्या है RELOS समझौता और इसकी शर्तें?

करीब आठ वर्षों की लंबी बातचीत के बाद, इस समझौते पर पिछले साल फरवरी में मॉस्को में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दिसंबर में अपनी मंजूरी दी थी। इस समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, नौसैनिक बंदरगाहों और हवाई पट्टियों का उपयोग शांति और युद्ध, दोनों ही स्थितियों में कर सकेंगे। इस समझौते की समय सीमा फिलहाल पांच वर्ष तय की गई है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के क्षेत्रों में 3,000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमान तक तैनात कर सकते हैं। यह समझौता केवल सैनिकों की आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ईंधन भरने, मरम्मत करने, भोजन, पानी और तकनीकी संसाधनों की आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक सहयोग भी शामिल हैं।

रूस का क्या होगा फायदा?

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता रूस के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। वर्तमान में हिंद महासागर में रूस का अपना कोई सैन्य बेस नहीं है। RELOS के जरिए मॉस्को को इस रणनीतिक क्षेत्र में अभूतपूर्व पहुंच प्राप्त होगी, जिससे वह लंबे समय तक अपने जहाजों और विमानों को यहां तैनात रख सकेगा। यह रूस के लिए इस क्षेत्र में अपनी शक्ति प्रदर्शन की क्षमता को बढ़ाएगा, खासकर तब जब वह पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

RELOS एग्रीमेंट इन्फोग्राफिक

भारत को क्या होगा फायदा?

भारत के लिए यह समझौता रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से भारतीय सेना को रूस के सुदूर पूर्व (Far East) और आर्कटिक क्षेत्रों तक पहुंच मिलेगी। व्लादिवोस्तोक से मरमंस्क तक के समुद्री मार्ग भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिहाज से अनिवार्य हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को मजबूत करता है और इसे पश्चिमी देशों के लॉजिस्टिक नेटवर्क से बाहर भी विकल्प प्रदान करता है।

अमेरिका और 'मल्टी-अलाइनमेंट' की चुनौती

यह समझौता ऐसे समय में आया है जब भारत पर अमेरिका और यूरोपीय देशों का रूस से दूरी बनाने का भारी दबाव है। भारत ने पहले ही अमेरिका के साथ 'LEMOA' जैसा समझौता कर रखा है लेकिन रूस के साथ हुआ यह नया करार उससे कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि इसमें सैनिकों की भौतिक तैनाती का प्रावधान है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भारत ने वाशिंगटन को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी एक देश के दबाव में नहीं है। यह समझौता यह भी दर्शाता है कि रूस आज भी भारत का सबसे भरोसेमंद और पुराना रक्षा साझेदार बना हुआ है।

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