IMF ने 2026 में मध्य पूर्व और मध्य एशिया की आर्थिक वृद्धि दर -0.3 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया।
कुवैत, इराक, कतर और बहरीन की अर्थव्यवस्थाओं में भारी गिरावट की आशंका है।
2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95.74 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है।
IMF Economic Outlook 2026: मध्य पूर्व में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व और मध्य एशिया क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर 2026 में गिरकर -0.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर खाड़ी के तेल उत्पादक देशों पर पड़ने का अनुमान है। वहीं, कच्चे तेल की औसत कीमत 95.74 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना जताई गई है।
IMF की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व और मध्य एशिया क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर 2025 के 3.7 प्रतिशत से घटकर 2026 में -0.3 प्रतिशत रह सकती है।
अप्रैल 2026 के अनुमान की तुलना में वृद्धि दर के अनुमान में 2.2 प्रतिशत अंक की कटौती की गई है। रिपोर्ट में इसकी प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने और ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली बाधाओं को बताया गया है। हालांकि, 2027 में इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है।
रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहने का सबसे गंभीर असर छोटे खाड़ी तेल उत्पादक देशों पर पड़ सकता है। 2026 में कुवैत की अर्थव्यवस्था 16.7 प्रतिशत, इराक की 16 प्रतिशत, कतर की 15.6 प्रतिशत और बहरीन की 11.3 प्रतिशत तक सिकुड़ने का अनुमान है। इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा उत्पादन और तेल-गैस के निर्यात पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में उत्पादन, परिवहन और निर्यात में रुकावट से उनकी आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
IMF ने 2027 में खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में मजबूत वापसी की संभावना जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, इराक की आर्थिक वृद्धि दर 19 प्रतिशत, कतर की 18.8 प्रतिशत, कुवैत की 17.1 प्रतिशत और बहरीन की 13.9 प्रतिशत रह सकती है। यह अनुमान ऊर्जा आपूर्ति और निर्यात मार्गों में सुधार की संभावना से जुड़ा है। हालांकि, वास्तविक रिकवरी क्षेत्र में सुरक्षा हालात और ऊर्जा कारोबार के सामान्य होने पर निर्भर करेगी।
IMF के अनुमान के मुताबिक, सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था 2026 में 3.3 प्रतिशत सिकुड़ सकती है, जबकि 2027 में 7.9 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की अर्थव्यवस्था में 2026 के दौरान 3.9 प्रतिशत की गिरावट और 2027 में 7.7 प्रतिशत की वृद्धि संभव है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब के पास तेल निर्यात के अपेक्षाकृत विविध मार्ग होने से उसे कुछ राहत मिल सकती है। वहीं, ओमान इस क्षेत्र के अन्य देशों से अलग रह सकता है और 2026 में उसकी अर्थव्यवस्था 4.1 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है।
रिपोर्ट में ईरान की अर्थव्यवस्था के 2026 में 7.6 प्रतिशत सिकुड़ने का अनुमान लगाया गया है। सैन्य तनाव, प्रतिबंधों और समुद्री परिवहन में बाधाओं से देश की आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। IMF के अनुसार, ईरान में महंगाई दर 78.6 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। इससे आम लोगों की क्रय शक्ति और देश की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। IMF की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले इस रास्ते से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता था, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब एक-चौथाई है।
इसके बंद रहने से तेल और गैस की आपूर्ति, परिवहन लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खाड़ी देशों ने कुछ निर्यात दूसरे बंदरगाहों के जरिए भेजने की कोशिश की है और खाड़ी क्षेत्र के बाहर तेल उत्पादन में प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल की वृद्धि हुई है।
IMF ने 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95.74 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान जताया है। यह 2025 के 67.74 डॉलर प्रति बैरल के औसत भाव से काफी अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2027 में कच्चे तेल की कीमत घटकर 87.39 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इसके अलावा, 2026 में प्राकृतिक गैस की कीमतों में 48 प्रतिशत तक वृद्धि का अनुमान है। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन, बिजली और उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है।
IMF के अनुसार, मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र के समर्थन से भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बनी हुई है।
हालांकि, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर परिवहन और उत्पादन लागत के जरिए आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।
IMF ने आगाह किया है कि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने या लंबे समय तक जारी रहने से ऊर्जा और खाद्य कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ने, आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ने और देशों के वित्तीय संतुलन पर दबाव बढ़ने का खतरा है। ऐसे हालात में ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते, महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।