द औरंगाबाद हाउस  (सोर्स- नवभारत लाइव)
वाराणसी

दारा शिकोह की ज्ञान परंपरा से कांग्रेस की राजनीति तक, चार सदियों के विरासत की गवाह है काशी का द औरंगाबाद हाउस

Aurangabad House History: द औरंगाबाद हाउस मुगलकालीन स्मृतियों से लेकर भारतीय राजनीति की कहानियों से जुड़ा है। जानें दारा शिकोह, कमलापति त्रिपाठी-कांग्रेस की राजनीतिक विरासत से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग।

धर्मेंद्र कुमार चौबे, स्निग्धा श्रीवास्तव

Highlights

  • काशी के ऐतिहासिक भवन में देखें मुगलकाल से आधुनिक भारत तक के बदलते दौर

  • महात्मा गांधी, नेहरू, शास्त्री और इंदिरा-राजीव गांधी से जुड़ी हैं यादें

  • कमलापति त्रिपाठी के दौर में बना यूपी की राजनीति का प्रमुख केंद्र

  • चार दशक तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रमुख केंद्र

The Aurangabad House Varanasi: काशी की गलियों में इतिहास केवल मंदिरों, घाटों और प्राचीन इमारतों में ही नहीं, बल्कि उन घरों में भी सांस लेता है, जिन्होंने सदियों के बदलते दौर को करीब से देखा है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक भवन है वाराणसी का ‘द औरंगाबाद हाउस’। करीब चार सौ साल पुरानी बताई जाने वाली इस विरासत का संबंध मुगलकाल से लेकर आधुनिक भारतीय राजनीति तक के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों से जोड़ा जाता है। परिवार की स्मृतियों के मुताबिक, मुगल शहजादे दारा शिकोह से लेकर महात्मा गांधी, महामना मदन मोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक का इस परिवार से जुड़ाव रहा है।

एक समय यह भवन केवल एक पारिवारिक आवास नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रमुख केंद्र भी बन गया था। पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी के राजनीतिक प्रभाव के दौर में यहां कांग्रेस की रणनीतियों, संगठन और चुनावी समीकरणों पर चर्चा होती थी। आज भी ‘द औरंगाबाद हाउस’ काशी की ऐतिहासिक विरासत और देश की राजनीतिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

दारा शिकोह और काशी की ज्ञान परंपरा से जुड़ी कहानी

द औरंगाबाद हाउस की कहानी मुगलकाल से जोड़कर देखी जाती है। काशी में एक पुरानी कहावत प्रचलित रही है- ‘काशी बसें तो क्या बसें, घर औरंगाबाद।’ परिवार की परंपराओं के अनुसार, इसका संबंध उस दौर से है, जब मुगल शहजादे दारा शिकोह संस्कृत और भारतीय दर्शन के अध्ययन के लिए काशी आए थे।

कहा जाता है कि दारा शिकोह ने संस्कृत की शिक्षा के लिए पंडित रामनंदपति त्रिपाठी से संपर्क किया था। उस समय एक मुगल शहजादे को संस्कृत पढ़ाने को लेकर कुछ लोगों ने विरोध जताया, लेकिन पंडित रामनंदपति ने ज्ञान को सर्वोपरि माना। उनसे जुड़ा एक कथन आज भी सुनाया जाता है- ‘ज्ञान की पिपासा लेकर ड्योढ़ी पर आए किसी भी व्यक्ति को शिक्षा का दान देना ही ब्राह्मणत्व है।’

परिवार की मान्यताओं के मुताबिक, दारा शिकोह के आग्रह पर पंडित रामनंदपति त्रिपाठी ने ‘विराट विवरणम्’ नामक रचना भी लिखी थी। पंडित रामनंदपति को पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी का पूर्वज बताया जाता है। कहा जाता है कि मुगलकाल में त्रिपाठी परिवार देवरिया क्षेत्र से काशी के औरंगाबाद इलाके में आकर बसा था। समय के साथ यह आवास परिवार की पहचान बना और आगे चलकर ‘द औरंगाबाद हाउस’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इन ऐतिहासिक प्रसंगों की स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है, लेकिन परिवार की स्मृतियों में इनका विशेष महत्व है। यह कहानी काशी की उस परंपरा को भी रेखांकित करती है, जिसमें ज्ञान, शिक्षा और संवाद को विशेष स्थान दिया गया है।

गांधी, मालवीय और नेहरू से जुड़ीं स्मृतियां

द औरंगाबाद हाउस का इतिहास केवल मुगलकालीन प्रसंगों तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी इस परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कमलापति त्रिपाठी के पौत्र और तृणमूल कांग्रेस के नेता राजेशपति त्रिपाठी के मुताबिक, परिवार का कांग्रेस से जुड़ाव वर्ष 1905 से रहा, जब उनके पूर्वज पंडित नारायणपति त्रिपाठी बनारस में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति के सदस्य बने थे।

इसी वर्ष कमलापति त्रिपाठी का जन्म हुआ। आगे चलकर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उनके राजनीतिक जीवन को नई दिशा दी। राजेशपति त्रिपाठी बताते हैं कि गांधीजी से प्रभावित होकर कमलापति त्रिपाठी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। महामना मदन मोहन मालवीय ने उन्हें पहले पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया।

परिवार की स्मृतियों में पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ साइकिल पर बैठकर काशी विद्यापीठ स्थित कांग्रेस कार्यालय जाने का प्रसंग भी शामिल है। लाल बहादुर शास्त्री के साथ कमलापति त्रिपाठी की आत्मीयता के किस्से भी सुनाए जाते हैं। बाद के वर्षों में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ उनके राजनीतिक संबंधों ने इस आवास को राष्ट्रीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों से जोड़ दिया।

चार दशक तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रमुख केंद्र

पंडित कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में रेल मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। कांग्रेस संगठन में उनके प्रभाव के कारण द औरंगाबाद हाउस एक दौर में प्रदेश की राजनीति का प्रमुख केंद्र बन गया था।

राजेशपति त्रिपाठी के अनुसार, करीब चार दशक तक यहां कांग्रेस की रणनीतियों, चुनावी समीकरणों और संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होती रही। उस समय कमलापति त्रिपाठी और सी.बी. गुप्ता के राजनीतिक गुटों का भी प्रभाव था। इस आवास से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियों ने इसे काशी से लेकर लखनऊ तक की सियासत में खास पहचान दिलाई।

कमलापति त्रिपाठी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच मतभेद का एक प्रसंग भी चर्चित है। राजेशपति त्रिपाठी के मुताबिक, रेल मंत्रालय के कामकाज पर इंदिरा गांधी की एक टिप्पणी से आहत होकर कमलापति त्रिपाठी ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। परिवार का दावा है कि इंदिरा गांधी ने उन्हें मनाने का प्रयास किया और दोनों के बीच इस मुद्दे पर पत्राचार भी हुआ था।

कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस संगठन को लेकर भी चिंतित रहते थे। राजेशपति के अनुसार, उन्होंने राजीव गांधी को कई बार आगाह किया था कि बड़े नेताओं और मंत्रियों की कार्यकर्ताओं से बढ़ती दूरी पार्टी को कमजोर कर रही है। उनका मानना था कि कांग्रेस को मजबूत बनाए रखने के लिए वरिष्ठ नेताओं का जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से संवाद जरूरी है।

वर्ष 1989 के एक प्रसंग में भी उन्होंने बनारस और चंदौली जैसे क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया था। राजेशपति त्रिपाठी का कहना है कि कमलापति त्रिपाठी ने बहुत पहले ही कांग्रेस के कमजोर होते संगठन को लेकर चिंता जताई थी। आज पार्टी की स्थिति पर चर्चा के दौरान उनकी ये बातें फिर याद की जाती हैं।

इतिहास और सियासत की अनूठी विरासत

द औरंगाबाद हाउस की कहानी काशी की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत का एक अनूठा अध्याय है। एक ओर इसकी स्मृतियां दारा शिकोह और संस्कृत अध्ययन से जुड़े प्रसंगों तक जाती हैं, तो दूसरी ओर यह स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक भारतीय राजनीति के कई बड़े नेताओं से जुड़ी रही हैं।

कमलापति त्रिपाठी के दौर में इस भवन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई। यहां से जुड़ी कहानियां बताती हैं कि कभी काशी का एक पारिवारिक आवास प्रदेश की राजनीतिक रणनीतियों और कांग्रेस के संगठनात्मक फैसलों का अहम केंद्र हुआ करता था।

आज भी द औरंगाबाद हाउस केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों के इतिहास, ज्ञान परंपरा, राजनीतिक संघर्ष और बदलते समय का गवाह है। इसकी विरासत काशी की उस पहचान को सामने लाती है, जहां अतीत की स्मृतियां वर्तमान की राजनीति और समाज को समझने का अवसर देती हैं।

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