Ramnagar Ramlila 2026: काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी ऐतिहासिक रामनगर रामलीला का शुभारंभ आज, 25 सितंबर यानी अनंत चतुर्दशी से होगा। करीब दो सौ वर्ष पुरानी इस विश्वप्रसिद्ध रामलीला के साथ अगले एक महीने तक रामनगर का पूरा क्षेत्र रामकथा के विभिन्न प्रसंगों से जीवंत रहेगा। परंपरागत रूप से काशी नरेश के संरक्षण में आयोजित होने वाली यह रामलीला श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ संपन्न होगी।
रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता इसका पारंपरिक और अनूठा आयोजन स्वरूप है। यह किसी एक मंच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि रामनगर और आसपास के करीब 5 से 10 किलोमीटर के क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर बनाए गए लगभग 40 खुले लीला स्थलों पर आयोजित की जाती है। इन स्थलों को रामकथा के प्रसंगों के अनुरूप अयोध्या, जनकपुरी, चित्रकूट, लंका आदि के रूप में सजाया जाता है। लीला के अलग-अलग दिनों में श्रद्धालु और दर्शक एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचकर कथा के प्रसंगों का साक्षी बनते हैं।
रामलीला के पहले दिन रावण जन्म और श्रीराम अवतार से जुड़े प्रसंगों का मंचन किया जाएगा। इसके साथ ही रामकथा की वह यात्रा शुरू होगी, जो अगले करीब एक महीने तक अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से आगे बढ़ेगी। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, माता सीता, हनुमान और रावण सहित रामायण के प्रमुख पात्रों की लीलाएं निर्धारित स्थलों पर परंपरागत तरीके से प्रस्तुत की जाएंगी।
रामनगर रामलीला की प्राचीन परंपराओं को आज भी काफी हद तक उसी स्वरूप में बनाए रखा गया है। लीला के दौरान माइक और आधुनिक प्रकाश व्यवस्था का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पारंपरिक रूप से मशाल और पेट्रोमैक्स की रोशनी में लीला का मंचन होता है। पात्र ऊंची और स्पष्ट आवाज में संवाद बोलते हैं, जबकि दर्शक खुले मैदान में खड़े या बैठे होकर प्रसंगों को देखते हैं।
यही पारंपरिक शैली रामनगर रामलीला को देश-दुनिया की अन्य रामलीलाओं से अलग पहचान देती है। यहां मंच और दर्शकों के बीच की दूरी भी पारंपरिक रंगमंच की तरह स्थिर नहीं रहती, बल्कि कथा के प्रसंग के साथ पूरा वातावरण और स्थान बदलता जाता है।
रामनगर में शुरू होने वाली इस रामलीला के दौरान रामकथा के प्रमुख प्रसंगों का क्रमवार मंचन होगा। अयोध्या से लेकर जनकपुर, वनवास, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और अंततः श्रीराम के अयोध्या लौटने तथा राज्याभिषेक तक की कथा अलग-अलग लीला स्थलों पर प्रस्तुत की जाएगी।
रामलीला देखने के लिए वाराणसी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और देश के अलग-अलग हिस्सों से भी श्रद्धालु और पर्यटक रामनगर पहुंचते हैं। लीला के दौरान रामनगर का वातावरण धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंगा नजर आता है।
रामनगर की रामलीला को उसकी ऐतिहासिकता, परंपरा और विशिष्ट आयोजन शैली के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी सूची में स्थान मिला है। करीब दो शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों, कलाकारों और आयोजकों के सहयोग से आगे बढ़ रही है।
आज अनंत चतुर्दशी के अवसर पर जैसे ही रामलीला का शुभारंभ होगा, रामनगर एक बार फिर अगले करीब एक महीने के लिए रामकथा की जीवंत नगरी में तब्दील हो जाएगा। अंतिम चरण में श्रीराम के अयोध्या लौटने और राज्याभिषेक के साथ इस ऐतिहासिक रामलीला का समापन होगा।