हाईकोर्ट बोला- यूपी पुलिस को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की परवाह नहीं
दो दिन अवैध हिरासत के आरोप पर पुलिस CCTV फुटेज नहीं दिखा सकी
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को ₹20 हजार हर्जाना देने को कहा
UP Police High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़ी स्थिति शर्मनाक है। पुलिस को लोगों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की बहुत कम परवाह है। इन अधिकारों का उल्लंघन यूपी पुलिस के लिए रोजमर्रा की बात बनता जा रहा है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी 3 नवंबर को दिए गए आदेश में की। कोर्ट ने उन मामलों पर चिंता जताई, जिनमें पुलिस पर अवैध हिरासत में रखने के आरोप लगते हैं, लेकिन मांगने पर पुलिस सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं करा पाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब भी कोर्ट पुलिस से सीसीटीवी फुटेज मांगता है, तो ज्यादातर मामलों में एक ही तरह की रिपोर्ट दी जाती है। इसमें किसी न किसी कारण से फुटेज उपलब्ध नहीं होने की बात कही जाती है।
शनिवार को कोर्ट एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह याचिका एक व्यक्ति की बेटी ने दाखिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने उसके पिता को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले दो दिन तक अवैध हिरासत में रखा था। पुलिस ने 7 सितंबर को हनीट्रैप से जुड़ी शिकायत के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया था।
अवैध हिरासत के आरोप की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर को पुलिस को संबंधित अवधि की सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया था। इसके जवाब में पुलिस ने बताया कि फुटेज उपलब्ध नहीं है। पुलिस के अनुसार, 5 सितंबर को थाने में हुई एक घटना के कारण सीसीटीवी काम नहीं कर रहा था।
थाने की जनरल डायरी में सीसीटीवी खराब होने की वजह आंधी-तूफान बताई गई थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि अवैध हिरासत के मामले में पुलिस इस तरह का बहाना नहीं बना सकती।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस की ओर से इस तरह का जवाब मिलने पर याचिकाकर्ता का यह दावा सही माना जा सकता है कि संबंधित व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि सच्चाई छिपाने के लिए जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के पिता को रिहा करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने बिजनौर जिले के नांगल थाने की थाना प्रभारी अनु कुमारी की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने जानबूझकर सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराई।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि कोर्ट की नाराजगी को थाना प्रभारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। साथ ही राज्य सरकार उनके मौजूदा पद पर बने रहने पर भी विचार करे।
कोर्ट ने यूपी सरकार को याचिकाकर्ताओं को 20 हजार रुपये हर्जाने के रूप में देने का आदेश भी दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पीके सिंह ने पैरवी की।