Mohan Bhagwat Lucknow Visit: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव होने है, लेकिन इससे पहले ही प्रदेश में राजनीति माहौल गर्म होना शुरु हो गया है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत तीन दिवसीय दौरे पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आए हुए थे। जहां उन्होंने कई कार्यक्रमों में भाग लिया। इसके साथ ही उन्होंने संघ के उच्च अधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री योगी अदित्यनाथ के साथ बैठक करते नजर आए।
मोहन भागवत का लखनऊ दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर तब जब प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंके जा चुके हैं और तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरु कर दी है। हालांकि, संघ ने इसे सामान्य संगठनात्मक कार्यक्रम और शताब्दी वर्ष की समीक्षा बताया, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे आने वाले चुनावों की तैयारी से जोड़कर देख रहे हैं।
मोहन भागवत का यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) 2027 में लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए भाजपा और संघ के बीच तालमेल को और मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए ‘ट्रिपल एस मॉडल’ को सबसे अहम रणनीति माना जा रहा है।
ट्रिपल एस मॉडल का मतलब है संघ, संगठन और सरकार के बीच मजबूत तालमेल बनाना। इसके तहत संघ वैचारिक ताकत और अनुशासित कार्यकर्ताओं का नेटवर्क उपलब्ध कराएगा। वहीं, संगठन यानी भाजपा चुनावी रणनीति तैयार करने से लेकर बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का काम करेगी। जबकि सरकार अपने कामकाज और योजनाओं के जरिए जनता के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाने का काम करेगी। माना जाता है कि जब ये तीनों साथ मिलकर एक दिशा में करना शुरु सकते हैं तो भाजपा की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। पिछले कई चुनावों में इस मॉडल का असर देखने को मिला है।
लखनऊ में अपने प्रवास के दौरान मोहन भागवत ने अवध गोरक्ष काशी और कानपुर क्षेत्र के स्वयंसेवकों और पदाधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलन और शाखा विस्तार जैसे मुद्दों पर अहम फैसले लिए गए हैं। इसके अवाला संघ शताब्दी वर्ष के तहत चल रहे तमाम कार्यक्रमों के जरिए यह जानने की कोशिश कर रही है कि जमीनी स्तर पर संगठन कितना सक्रिय है और किन क्षेत्रों में और काम करने की जरूरत है।
अपने इस दौरे के दौरान मोहन भागवत ने मुख्यमंत्री , उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक समेत भाजपा के कई बड़े नेताओं से मुलाकात की है। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाना माना जा रहा है। संघ लंबे समय से भाजपा को जमीनी फीडबैक देता रहा है। यह ऐसा फीडबैक होता है जो अक्सर सरकारी अधिकारियों के जरिए ऊपर तक नहीं पहुंच पाता। इससे सरकार को जनता की नाराजगी और अपेक्षाओं को समझने में मदद मिलती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसके पीछे विपक्ष के पीडीए फार्मूले और भाजपा के अंदरूनी मतभेदों को कारण बताया था। विपक्ष ने पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को एक साथ जोड़ने की कोशिश की थी। अब भाजपा और संघ इसी चुनौती का जवाब देने की तैयारी में जुटे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में संघ की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। जब भी भाजपा कमजोर हुई है, संघ ने संगठन को मजबूत करने का काम किया है। 1984 में भाजपा केवल दो सीटों पर सिमट गई थी लेकिन इसके बाद राम मंदिर आंदोलन के जरिए संघ ने हिंदू समाज को एकजुट किया। इसका फायदा भाजपा को 1991 में मिला जब पार्टी ने पहली बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई।
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इसी तरह 2002 से 2012 के बीच भाजपा कमजोर हुई तो संघ ने अपनी रणनीति बदली। केवल सवर्ण समाज तक सीमित रहने की जगह पिछड़े और दलित समाज के बीच सेवा कार्य शुरू किए गए। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में संघ के कार्यकर्ताओं ने बूथ स्तर पर मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। यही कारण है कि मोहन भागवत के लखनऊ दौरे को केवल सामान्य संगठनात्मक दौरे से अलग राजनीतिक दौरा अधिक माना जा रहा है।