Vrindavan Elderly Couple Abandoned: कहते हैं कि खून के रिश्ते दुनिया में सबसे मजबूत होते हैं, लेकिन जब यही रिश्ते बुढ़ापे में साथ छोड़ दें तो इंसान के सामने जिंदगी काटना भी मुश्किल हो जाता है। वृंदावन में ऐसी ही एक मार्मिक तस्वीर सामने आई, जहां पंजाब के भटिंडा निवासी बुजुर्ग दंपति राजेंद्र और संतोष कई दिनों तक अटल्ला चुंगी के पास सड़क किनारे बेहद दयनीय हालत में पड़े रहे। बताया जा रहा है कि उनके अपने रिश्तेदार उन्हें वहां छोड़कर चले गए थे।
वृंदावन की अटल्ला चुंगी पर रोजाना हजारों श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। इसी भीड़भाड़ वाले इलाके में बुजुर्ग दंपति मदद की आस में पड़े रहे। उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें परिवार के सहारे और देखभाल की जरूरत थी, वहीं वे कथित तौर पर भूख, प्यास और बीमारी से जूझते रहे। दोनों की हालत इतनी खराब थी कि वे ठीक से चल-फिर भी नहीं पा रहे थे।
स्थानीय लोगों से बुजुर्ग दंपति की हालत की जानकारी मिलने के बाद वृंदावन के अपना घर आश्रम की टीम मौके पर पहुंची। सेवादारों ने दोनों को वहां से उठाकर आश्रम पहुंचाया। आश्रम में उनका उपचार शुरू कराया गया और रहने, खाने-पीने के साथ उनकी देखभाल की जा रही है।
अपना घर आश्रम से जुड़े लोगों के मुताबिक, सूचना मिली थी कि अटल्ला चुंगी के पास एक बुजुर्ग दंपति बेहद खराब हालत में पड़े हैं। टीम जब मौके पर पहुंची तो दोनों चलने-फिरने में भी असमर्थ थे। उनके अनुसार, परिवार के लोग उन्हें वहां छोड़कर चले गए थे। इसके बाद दोनों को आश्रम में लाकर सेवा और उपचार की व्यवस्था की गई।
इस पूरे मामले ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। क्या संतान न होना किसी बुजुर्ग के लिए अपराध है? क्या उम्र के अंतिम पड़ाव में परिवार का साथ छोड़ देना ही उनकी नियति है? राजेंद्र और संतोष की कहानी रिश्तों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर सवाल खड़े करती है।
बताया जा रहा है कि परिवार में एक भाई बड़े पद पर कार्यरत हैं। वहीं दूसरी ओर उनकी बहन और बहनोई के कथित तौर पर इस तरह बेसहारा मिलने की बात सामने आई है। हालांकि परिवार की ओर से इस मामले में क्या पक्ष है और बुजुर्ग दंपति को किन परिस्थितियों में वृंदावन लाया गया, इसकी पूरी तस्वीर संबंधित पक्षों के बयान और जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
एक तरफ जहां अपनों से दूरी और कथित उपेक्षा की यह तस्वीर सामने आई, वहीं दूसरी तरफ अपना घर आश्रम के सेवादारों ने दोनों बुजुर्गों को सहारा देकर इंसानियत की मिसाल पेश की है। सड़क किनारे बेबसी में पड़े राजेंद्र और संतोष को अब आश्रम में भोजन, उपचार और अपनों जैसा स्नेह मिल रहा है।
वृंदावन की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि जिस उम्र में बुजुर्गों को परिवार की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस समय उन्हें अकेला छोड़ देना आखिर किस तरह की सामाजिक संवेदनशीलता है।