Highlights:
कानपुर में 158 साल पुरानी परंपरा
विजयदशमी पर होगा रावण का अभिषेक, श्रृंगार और पूजन
रावण के जन्मदिन और मोक्ष की मान्यता से जुड़ा है मंदिर
दशानन मंदिर में सुबह से जुटते हैं हजारों श्रद्धालु
Dashanan Temple Kanpur: जहां एक तरफ देश में भर विजयादशमी पर रावण को जलाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा मंदिर है, जहां रावण की पूजा की जाती है। हालांकि इस मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक बार विजयदशमी के पर्व पर खुलते हैं। रावण की महाज्ञानी स्वरूपी प्रतिमा के दर्शन करने के लिए कई प्रदेशों से हजारों भक्त यहां विजयदशमी के दिन पहुंचते हैं।
पूरे देश में जहां विजयदशमी के पर्व पर रावण के पुतले की दहन की तैयारी शुरू होती है। मेले लगते हैं, रामलीला का मंचन किया जाता है और रावण के पुतले के दहन के साथ ही असत्य पर सत्य की जीत और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक कहा जाता है। वही देश का एक ऐसा राज्य भी है जहां विजयदशमी पर रावण के पुतले का दहन नहीं बल्कि रावण की पूजा की जाती है। हजारों की संख्या में भक्त यहां रावण का दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, क्योंकि साल में एक बार ही इस मंदिर के कपाट रावण के दर्शन के लिए खोले जाते हैं।
वर्ष 1868 में गुरु प्रसाद शुक्ल ने कानपुर के शिवालय स्थित कैलाश मंदिर के सामने दशानन मंदिर का निर्माण कराया था। महज छोटी सी जगह में कराए गए मंदिर में भगवानों की नहीं बल्कि रावण की प्रतिमा लगाई गई थी। रावण की इस प्रतिमा को रावण की महाज्ञानी स्वरूपी प्रतिमा कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि रावण के पास इतना ज्ञान था कि भगवान श्री राम ने लक्ष्मण जी से यह कहा था कि वह रावण से ज्ञान प्राप्त करें और स्वयं लक्ष्मण जी को रावण के पास ज्ञान लेने के लिए भेजा था, इसीलिए 1868 में गुरु प्रसाद शुक्ल ने इस मंदिर का निर्माण कराया और यहां रावण की महाज्ञानी स्वरूपी प्रतिमा स्थापित की गई।
इसके बाद से पिछले 158 वर्षों से कानपुर में यह परंपरा चली आ रही है। विजयदशमी के पर्व पर प्रातः कल इस मंदिर के कपाट विधि विधान के साथ खोले जाते हैं। सबसे पहले मंदिर के पुजारी दूध, दही, शहद, गंगाजल से रावण की प्रतिमा का अभिषेक करते हैं। फिर रावण की प्रतिमा का भव्य श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद विधि विधान से पूजन करने के बाद मंदिर भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है। इस मंदिर में केवल इतनी ही जगह है जहां पर रावण की प्रतिमा स्थापित हो सके। दर्शन करने आने वाले भक्त सड़क पर खड़े होकर ही दशानन मंदिर में स्थित रावण की प्रतिमा के दर्शन करते हैं और दीपक जलाकर अपनी मन्नत मांगते हैं।
मंदिर के पुजारी पंडित राम शुक्ला ने बताया कि रावण के दर्शन करने के लिए कानपुर शहर की नहीं उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य कई प्रदेशों से हजारों भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं। भक्तों की संख्या इतनी होती है कि मंदिर के पुजारी और मंदिर की कमेटी भक्तों को संभाल नहीं पाती। लोग दर्शन करने के लिए उतावले होते हैं। उन्होंने बताया कि इस मंदिर के कपाट साल में एक ही बार खुलते हैं जिसकी वजह से यहां भक्त सुबह से ही पहुंचने लगते हैं। भक्तों को विजयदशमी पर्व का इंतजार होता है।
कानपुर के दशानन मंदिर में विजयदशमी के पर्व पर सुबह रावण की प्रतिमा का अभिषेक और भव्य श्रृंगार करने के बाद भक्त दर्शन करते हैं। परंपरा यह है कि यहां सुबह रावण का जन्मदिन मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि विजयदशमी के पर्व के ही दिन रावण का जन्म हुआ था और इसी दिन उसको मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इस प्रकांड ज्ञान और नितिवान स्वरूप के दर्शन करने के लिए कानपुर में यह परंपरा पिछले 158 वर्षों से चली आ रही है। सुबह से लेकर दोपहर 12:00 तक रावण का जन्मदिन मनाने के साथ ही उसके दर्शन कर भक्त अपनी मन्नत मांगते हैं और फिर साल में एक बार खुलने वाले कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद शाम को भगवान श्रीराम के हाथों रावण का वध होता है और रावण को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।