इलाबाहाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया) 
उत्तर प्रदेश

44 साल बाद मिला इंसाफ: 100 साल के धनी राम को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मर्डर केस में किया बरी

Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में 1982 के एक मर्डर केस में 100 साल के धनी राम को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। 44 साल लंबे चले इस कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें न्याय मिला है।

प्रतीक पाण्डेय

Hamirpur Murder Case 1982: न्याय मिलने में भले देरी हुई हो लेकिन 100 साल के धनी राम के लिए अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत आ ही गई। अदालत ने चार दशक से ज्यादा पुराने मर्डर केस में धनी राम को बरी करते हुए कहा कि अपील का लंबे समय तक लंबित रहना और आरोपी की उम्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले का है जहां साल 1982 में जमीन से जुड़े एक विवाद ने हिंसक रूप ले लिया था। इस विवाद के दौरान हुई हत्या के मामले में पुलिस ने तीन लोगों- मैकू, सत्ती दीन और धनी राम को आरोपी बनाया था। हत्याकांड के तुरंत बाद मुख्य आरोपी मैकू फरार हो गया था, जबकि सत्ती दीन और धनी राम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिली जीत

हमीरपुर सेशंस कोर्ट में इस मामले की सुनवाई दो साल तक चली और साल 1984 में कोर्ट ने सत्ती दीन और धनी राम को उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि धनी राम को उसी साल जमानत मिल गई थी, लेकिन कानूनी लड़ाई का बोझ उनके कंधों पर अगले 42 सालों तक बना रहा। इस लंबी अवधि के दौरान उनके साथी अपीलकर्ता सत्ती दीन की मौत हो गई, जिसके बाद धनी राम इस केस में एकमात्र जीवित अपीलकर्ता रह गए थे।

चार दशकों का इंतजार और हाईकोर्ट का रुख

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बेंच ने इस अपील पर सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि धनी राम अपनी जिंदगी के 100 वसंत देख चुके हैं और उनके द्वारा दायर की गई अपील चार दशकों से अधिक समय से लंबित थी। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इतनी लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान आरोपी ने जो सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना झेली है, उसे न्याय देते समय कम करके नहीं आंका जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान धनी राम के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल की उम्र अब लगभग 100 साल है। वकील ने यह भी स्पष्ट किया कि मूल आरोपों के अनुसार धनी राम ने केवल मुख्य आरोपी मैकू को गोली चलाने के लिए उकसाया था, वह स्वयं मुख्य शूटर नहीं थे।

अभियोजन पक्ष की नाकामी और 'उचित संदेह'

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष की जांच पर कड़े सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि यह फैसला केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि मामले की खूबियों पर आधारित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि जब न्याय की मांग की जाती है, तो दशकों तक आरोपी द्वारा झेली गई चिंता और अनिश्चितता के परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसी के साथ कोर्ट ने निर्देश दिया कि धनी राम के जमानत बॉन्ड को तत्काल समाप्त किया जाए और उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया जाए।

न्याय में देरी और सामाजिक परिणाम

इस ऐतिहासिक फैसले ने एक बार फिर भारतीय न्यायिक प्रणाली में केसों के लंबे समय तक लंबित रहने के मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। 1982 में शुरू हुआ यह मामला 2026 में जाकर समाप्त हुआ है। कोर्ट ने स्वयं स्वीकार किया कि इस लंबी अवधि में आरोपी ने जो सामाजिक परिणाम झेले हैं, वे उसकी सजा से कहीं अधिक थे।

100 साल की उम्र में बरी होने वाले धनी राम के लिए यह फैसला कानूनी जीत से बढ़कर एक भावनात्मक राहत है, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का लगभग आधा हिस्सा एक 'हत्यारोपी' के टैग के साथ बिताया था।

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