Chhotelal Verma Last Rites Fatehabad: आखिरकार फतेहाबाद विधानसभा की सियासत के उस चेहरे को अंतिम विदाई दे दी गई, जिसने करीब तीन दशक से अधिक समय तक क्षेत्र की राजनीति को अपने अंदाज में प्रभावित किया। चार बार विधायक रहे छोटेलाल वर्मा शुक्रवार को पंचतत्व में विलीन हो गए। उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए मानो पूरा फतेहाबाद विधानसभा क्षेत्र उमड़ पड़ा। पैतृक गांव नगला देवहंस में अंतिम दर्शन के लिए हजारों की भीड़ पहुंची। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक करीब 12 से 15 हजार समर्थक और ग्रामीण अंतिम दर्शन के लिए जुटे।
यह सिर्फ किसी विधायक की अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक सफर का आखिरी पड़ाव था, जिसमें एक छोटे और साधारण परिवार से निकलकर छोटेलाल वर्मा ने फतेहाबाद की सियासत में अपना ऐसा मुकाम बनाया, जिसे उनके समर्थक अब उनकी विरासत के रूप में देख रहे हैं।
शुक्रवार को आगरा के शहीद नगर से शुरू हुई अंतिम विदाई की यात्रा जैसे-जैसे उनके पैतृक गांव देवहंस की ओर बढ़ी, वैसे-वैसे लोगों का कारवां भी बढ़ता चला गया। रास्ते में जगह-जगह लोग अपने नेता के अंतिम दर्शन के लिए खड़े दिखाई दिए।
फतेहाबाद विधानसभा क्षेत्र में उनके निधन के बाद शोक का ऐसा माहौल रहा कि श्रद्धांजलि स्वरूप कई बाजार बंद रहे। नगला देवहंस में पार्थिव शरीर पहुंचने से पहले ही बड़ी संख्या में लोग जुट चुके थे। अंतिम दर्शन के लिए लंबी कतारें लगीं और गांव का माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया।
किसी की आंखें नम थीं तो कोई अपने ‘बाबूजी’ को आखिरी बार देखने के लिए घंटों इंतजार करता रहा। भीड़ सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं की नहीं थी। क्षेत्र के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वर्गों के लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
छोटेलाल वर्मा की अंतिम यात्रा में राजनीतिक दलों की सीमाएं भी कुछ देर के लिए छोटी पड़ती दिखाई दीं।
पूर्व मंत्री रामसकल गुर्जर, फतेहपुर सीकरी सांसद राजकुमार चाहर, एत्मादपुर विधायक ठाकुर धर्मपाल सिंह, कैबिनेट मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, सपा राज्य सभा सांसद रामजीलाल सुमन समेत भाजपा के तमाम नेता और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। वहीं विपक्ष से जुड़े नेता भी अंतिम विदाई में बड़ी संख्या में पहुंचे।
जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ.मंजू भदौरिया, पूर्व विधायक डॉ.राजेंद्र सिंह, पूर्व विधायक जितेंद्र वर्मा, पूर्व सांसद सीमा उपाध्याय समेत कई नेताओं के पहुंचने की जानकारी सामने आई है।
यह दृश्य इस बात का संकेत था कि छोटेलाल वर्मा की राजनीतिक पहचान सिर्फ एक पार्टी या एक चुनाव तक सीमित नहीं थी। तीन दशक से ज्यादा लंबे सफर ने उन्हें फतेहाबाद की राजनीति का स्थायी चेहरा बना दिया था।
छोटेलाल वर्मा को लेकर उनके समर्थकों में अक्सर एक बात कही जाती थी- कद भले छोटा था, लेकिन राजनीतिक कद बड़ा था।
एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से निकलकर उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई। निषाद समाज से आने वाले छोटेलाल वर्मा ने अपनी राजनीति को केवल अपने समाज तक सीमित नहीं रखा। उनके समर्थकों का दावा रहा कि उन्होंने सर्वसमाज के मुद्दों को उठाया और क्षेत्र के कमजोर तथा पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ बनाई।
हालांकि उनके राजनीतिक कार्यकाल को लेकर राजनीतिक विरोधियों की अपनी आलोचनाएं भी रही हैं। 2025 में प्रकाशित एक क्षेत्रीय रिपोर्ट में उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर विपक्षी नेता की आलोचना भी दर्ज है।
यही लोकतांत्रिक राजनीति का दूसरा पहलू है- किसी नेता की विरासत केवल समर्थकों की प्रशंसा से नहीं, बल्कि उसके पक्ष और विपक्ष दोनों के अनुभवों से मिलकर बनती है।
छोटेलाल वर्मा के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1988 के ब्लॉक प्रमुख चुनाव से बताई जाती है। इसके बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति से अपनी जमीन तैयार की और धीरे-धीरे विधानसभा की राजनीति तक पहुंचे।
वर्ष 1993 में पहली बार भाजपा के टिकट पर फतेहाबाद से विधायक बने। 2002 में दूसरी बार भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की। 2012 में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं तो बसपा के टिकट पर मैदान में उतरे और तीसरी बार विधानसभा पहुंचे।
इसके बाद भाजपा में वापसी हुई और 2022 में उन्होंने चौथी बार फतेहाबाद विधानसभा सीट जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रमाण दिया।
फतेहाबाद सीट को चार बार जीतना अपने आप में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। ताजा प्रकाशित राजनीतिक प्रोफाइल में उन्हें फतेहाबाद के उन चुनिंदा नेताओं में गिना गया है, जिन्होंने निषाद समाज के साथ-साथ बघेल और लोधी मतदाताओं के बीच भी प्रभाव बनाया।
छोटेलाल वर्मा की राजनीति का एक पहलू उनका मुखर अंदाज भी रहा। वह कई मौकों पर स्थानीय समस्याओं को लेकर अधिकारियों के सामने खुलकर खड़े हुए।
मार्च 2025 में संविदा कर्मचारियों को हटाए जाने के विरोध में उनका बिजली विभाग के कार्यालय में जमीन पर बैठ जाना चर्चा में रहा। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों से नाराजगी जताई और भ्रष्टाचार की शिकायत मुख्यमंत्री से करने की बात कही थी।
यही तेवर उनके समर्थकों के बीच उनकी पहचान का हिस्सा रहे - ऐसा नेता जो स्थानीय मुद्दे पर जरूरत पड़ने पर अपनी ही सरकार और अधिकारियों के सामने भी आवाज उठाने से पीछे नहीं हटता था।
राजनीति में किसी नेता की असली पूंजी पद, कुर्सी और चुनावी जीत होती है या जनता के बीच बना संबंध - यह बहस हमेशा चलती रहेगी।
लेकिन छोटेलाल वर्मा की अंतिम यात्रा ने कम से कम एक तस्वीर जरूर सामने रख दी।
जिस रास्ते से उनका पार्थिव शरीर गुजरा, वहां लोगों की भीड़ बढ़ती गई। पैतृक गांव में हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। बाजार बंद रहे। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
और जब किसी नेता की अंतिम यात्रा में इतनी बड़ी संख्या में लोग अपने आप निकलकर आते हैं, तो वह दृश्य उसके राजनीतिक जीवन की एक अलग कहानी कहता है।
छोटेलाल वर्मा ऐसे समय में दुनिया से विदा हुए हैं, जब 2027 का विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं है। फतेहाबाद की राजनीति में उनकी अनुपस्थिति आने वाले समय में एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करेगी। भाजपा के सामने अब केवल एक विधायक की सीट भरने का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक रिक्तता को भरने की चुनौती भी होगी, जो तीन दशक से अधिक समय में धीरे-धीरे बनी थी।
कौन उनके समर्थकों और क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों को साथ लेकर आगे बढ़ पाएगा?
कौन वह राजनीतिक संवाद कायम कर पाएगा, जिसके कारण छोटेलाल वर्मा दशकों तक फतेहाबाद की राजनीति में प्रासंगिक बने रहे?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय की राजनीति देगी।
फिलहाल फतेहाबाद ने अपने एक पुराने राजनीतिक चेहरे को खो दिया है।
छोटेलाल वर्मा चले गए, लेकिन अपने पीछे एक ऐसी सियासी लकीर छोड़ गए हैं जिसे मिटाना शायद आसान नहीं होगा।
उनकी राजनीतिक यात्रा में उतार-चढ़ाव रहे, दल बदले, विवाद आए, आलोचनाएं हुईं और जीत भी मिलीं, लेकिन अंत में उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब उनके राजनीतिक जीवन की एक ऐसी तस्वीर छोड़ गया, जिसे फतेहाबाद लंबे समय तक याद रखेगा।
पंचतत्व में विलीन होने से पहले उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और नम आंखों से उनके चाहने वालों ने अपने ‘बाबूजी’ को अंतिम विदाई दी।
एक नेता चला गया... लेकिन उसके पीछे छूट गई उसकी सबसे बड़ी पूंजी - लोगों की याद और उसके साथ जुड़ी एक लंबी राजनीतिक कहानी।