Protest Against Batwara 1947 Controversy: 1947 का भारत विभाजन आज भी देश के इतिहास का ऐसा जख्म है, जिसकी टीस पीढ़ियों तक महसूस की जाती है। विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर विस्थापन, हिंसा और सांप्रदायिक तनाव ने लाखों परिवारों की जिंदगी बदल दी थी। इसी संवेदनशील इतिहास की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘बटवारा 1947’ को लेकर अब आगरा में विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
राजपुर चुंगी स्थित एक सिनेमा हॉल के बाहर योगी यूथ ब्रिगेड के प्रदेश अध्यक्ष अजय तोमर अपने समर्थकों के साथ पहुंचे और फिल्म के निर्माण को लेकर विरोध जताया। अजय तोमर ने आरोप लगाया कि फिल्म में विभाजन के दौर में मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग द्वारा हिंदुओं की मदद किए जाने की कहानी को प्रमुखता से दिखाया गया है, जबकि उनके मुताबिक विभाजन की वास्तविक त्रासदी और हिंदुओं पर हुए अत्याचारों का चित्रण उस स्वरूप में नहीं किया गया, जैसा होना चाहिए था।
अजय तोमर ने कहा कि विभाजन की विभीषिका सबसे ज्यादा हिंदू और सिख परिवारों ने झेली और हजारों परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा। उन्होंने फिल्म को लेकर कहा कि इतिहास को केवल भावनात्मक और मानवीय रिश्तों के चश्मे से दिखाने के बजाय उस दौर की हिंसा और विस्थापन की पूरी तस्वीर सामने रखी जानी चाहिए।
उन्होंने फिल्म के निर्माता आमिर खान और अभिनेता सनी देओल पर भी निशाना साधा। तोमर ने कहा कि सनी देओल ने ‘बॉर्डर’, ‘गदर’ और ‘मां तुझे सलाम’ जैसी फिल्मों में राष्ट्रवादी किरदारों से अलग पहचान बनाई, लेकिन इस फिल्म में उनकी भूमिका को लेकर उन्हें आपत्ति है।
उनके मुताबिक फिल्म में एक मुस्लिम किरदार को हिंदू महिला की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाते हुए दिखाया गया है, जिसे उन्होंने ‘इतिहास का सफेद झूठ’ करार दिया।
हालांकि, फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं और इसका निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के रिकॉर्ड के अनुसार फिल्म की कहानी 1947 के विभाजन के दौरान हिंसा, विस्थापन और एक हिंदू महिला के अपने घर में रह जाने की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
अजय तोमर ने यह भी दावा किया कि फिल्म को दर्शकों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा और बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रदर्शन कमजोर है और यह फ़िल्म फ्लॉप है। हालांकि फिल्म की कमाई को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि फिल्म 14 अगस्त 2026 को रिलीज हुई है और शुरुआती दिनों के आंकड़े लगातार बदल रहे हैं।
फिल्म को लेकर उठे इस विरोध ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि 1947 जैसे संवेदनशील और रक्तरंजित अध्याय को सिनेमा में किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाना चाहिए - इतिहास के दर्द के साथ या इंसानियत की उम्मीद के साथ? अब देखना होगा कि फिल्म को लेकर यह विवाद आने वाले दिनों में कितना बड़ा रूप लेता है।