Agra Municipal Corporation BJP Councillor Protest: आगरा में डबल इंजन नहीं बल्कि चार चार इंजनों की सरकारें हैं। केंद्र और राज्य के साथ साथ नगर निगम सदन और जिला पंचायत में भी भाजपा का किला बेहद मजबूत है, यहां भी बीते कई दशकों से भाजपा का झंडा बुलंद है, बावजूद इसके भाजपा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है।
यह हाल तब है जब केंद्र और राज्य में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार है। नगर निगम में भाजपा से मनोनीत पार्षद हैं सुनील करमचंदानी, इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के एक कद्दावर मंत्री का उन पर हाथ है। बावजूद इसके उनके कार्य 6-6 माह तक नहीं हो रहे। यह हकीकत है, जिसको लेकर बुधवार को उनके सब्र का बाँध टूट गया।
आगरा नगर निगम में विकास कार्यों की स्वीकृति को लेकर बुधवार को उस समय हंगामा खड़ा हो गया, जब भाजपा के नामित पार्षद सुनील करमचंदानी शौचालय निर्माण से जुड़ी फाइल को लेकर नगर आयुक्त के चैंबर में धरने पर बैठ गए।
पार्षद का आरोप था कि वह पिछले करीब छह महीने से शौचालय निर्माण के प्रस्ताव को लेकर नगर निगम के अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनके प्रस्ताव पर कार्रवाई नहीं की जा रही है।
पार्षद के अचानक धरने पर बैठने से नगर आयुक्त के चैंबर में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सुनील करमचंदानी ने नगर आयुक्त पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि जब विपक्षी पार्षद के प्रस्ताव पर टेंडर कराया जा सकता है तो उनके क्षेत्र में प्रस्तावित शौचालय निर्माण के कार्य को मंजूरी देने में इतनी देरी क्यों की जा रही है।
मामला बढ़ने पर नगर आयुक्त ने संबंधित अधिकारियों से पूरे प्रकरण की जानकारी ली। अधिकारियों की ओर से बताया गया कि करीब 32 लाख रुपये के विकास कार्य से संबंधित प्रस्ताव की निर्माण विभाग में तीन अलग-अलग फाइलें तैयार हो गई थीं। नगर आयुक्त ने तीनों फाइलों को देखने के बाद अधिकारियों को इन्हें दो फाइलों में व्यवस्थित करने के निर्देश दिए थे। इसी प्रक्रिया के चलते फाइल आगे बढ़ने में समय लगने की बात सामने आई।
इधर, पार्षद अपनी मांग पर अड़े रहे और नगर आयुक्त के चैंबर में जमीन पर ही धरने पर बैठ गए। काफी देर तक समझाने-बुझाने के बाद अधिकारियों ने उन्हें आश्वस्त किया। बताया गया कि नामित पार्षद के प्रस्ताव के आधार पर शौचालय निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। आश्वासन मिलने के बाद पार्षद का आक्रोश शांत हुआ और उन्हें बमुश्किल समझाकर जमीन से उठाकर कुर्सी पर बैठाया गया।
मामले में नगर आयुक्त ने स्पष्ट किया कि नगर निगम में विकास कार्यों की स्वीकृति किसी पार्षद की पार्टी देखकर नहीं, बल्कि क्षेत्र की आवश्यकता और प्रस्ताव की प्राथमिकता के आधार पर की जाती है। उन्होंने अधिकारियों से फाइल की स्थिति की जानकारी लेकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम में विकास कार्यों की फाइलों के निस्तारण और पार्षदों के प्रस्तावों पर होने वाली कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर पार्षद छह महीने से फाइल लंबित होने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं नगर निगम प्रशासन फाइलों की तकनीकी प्रक्रिया और जरूरत के आधार पर स्वीकृति दिए जाने की बात कह रहा है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि नामित पार्षद के प्रस्तावित शौचालय निर्माण की फाइल कितनी तेजी से आगे बढ़ती है और धरने के बाद दिए गए आश्वासन पर नगर निगम कब तक अमल करता है।