EVM (Source. Freepik) 
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कागज़ से डिजिटल तक, EVM ने बदला चुनाव का खेल, जानिए कैसे काम करती है ये मशीन और क्या हैं इसके फायदे-नुकसान

EVM Works: भारत में EVM का इस्तेमाल काफी लंबे समय से चल रहा है लेकिन उसके बाद भी लोगों को इसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक के बारें में पता नहीं है, ऐसे में इस खबर में EVM के बारें में सारी जानकारी है।

सिमरन सिंह

What is an EVM: भारत के पश्चिम बंगाल में आज चुनाव के नतीजे सामने आएंगे, वहीं इस प्रक्रिया को अब तेज और पारदर्शी कर दिया गया है। वैसे तो पूरे देश में अब चुनाव की प्रक्रिया को कागज से हटाकर EVM पर कर दिया गया है। इसके बारें में बताए तो 1990 के दशक तक भारतीय चुनावों में कागजी मतपत्रों का ही इस्तेमाल होता था। इस तरीके से पांच लाख लोगों द्वारा मैनुअल वोटिंग क्रियाविधि का इस्तेमाल करने के कारण, चुनाव से जुड़ी आपराधिक गतिविधियों में शामिल होना भी संभव हो गया था। इसी परेशानी को सही करने के लिए सिस्टम को बदलने पर जोर दिया और यहीं से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के दौर की शुरूआत हुई।

EVM क्या है और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM एक पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक मशीन है जिसका इस्तेमाल चुनाव कराने के लिए किया जाता है। EVM का इस्तेमाल संसद के साथ नगरपालिकाओं जैसे स्थानीय चुनावों के लिए भी किया जाता है। इसके साथ ही इस तकनीक के बारें में बताए तो EVM का माइक्रोकंट्रोलर वाला डिज़ाइन इसे सुरक्षित बनाता है। जिसमें एक व्यक्ति केवल 1 वोट डाल सकता है, जिससे अमान्य या फर्जी वोटों की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिससे वोटों की गिनती सटीक और तेज होती है।

सालों पहले आई तकनीक

1989 में भारत के चुनाव आयोग ने भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड यानी BEL और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी ECIL के साथ मिलकर EVM को बनाया था। जिसके बाद 1999 में पहली बार गोवा राज्य विधानसभा चुनावों में EVM का इस्तेमाल सही तरह से किया गया था।

कैसे काम करती है EVM? आसान भाषा में समझिए

EVM का इस्तेमाल मुख्य रूप से दो हिस्सों में बटा हुआ है जो है बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट। जिनको एक केबल से जोड़ा जाता है। मतदान करने के दौरान अधिकारी कंट्रोल यूनिट संभालता है और मतदाता बैलेटिंग यूनिट पर बटन दबाता है। इसके साथ ही यह मशीन 6V एल्कलाइन बैटरी पर चलती है, यानी बिजली न होने पर भी मतदान जारी रखा जा सकता है।

क्या है वोटिंग की प्रक्रिया?

वोटिंग प्रक्रिया को लोगों के लिए बेहद सरल रखा गया है, जिसमें उन्हें किसी से मदद लेने की जरूरत ना पड़े:

  • अधिकारी मशीन को एक्टिवेट करता है
  • मतदाता उम्मीदवार के सामने नीला बटन दबाता है
  • लाल बत्ती और बीप से वोट कन्फर्म होता है
  • बैलट स्लिप से पुष्टि भी देखी जा सकती है

EVM के फायदे: क्यों है गेम चेंजर?

EVM के आने से चुनाव की प्रक्रिया तेज और भरोसेमंद बन गई है। जिसमें कई फायदें शामिल है। जैसे की:

  • वोटिंग और काउंटिंग दोनों में समय की बचत
  • फर्जी वोटिंग और छेड़छाड़ की संभावना बेहद कम
  • एक व्यक्ति केवल एक वोट डाल सकता है
  • बैटरी से चलने के कारण कहीं भी इस्तेमाल संभव
  • NOTA बटन से मतदाता को अतिरिक्त विकल्प

अधिकारियों का कहना है कि EVM के आने के बाद से करोड़ों छपे मतपत्रों की बचत हुई है, जिसकी अनुमानित संख्या 10,000 टन से भी ज़्यादा की बताई जाती है।

EVM के नुकसान क्या है?

अगर किसी तकनीक के फायदें है तो उसके नुकसान भी होते है जो उसपर सवाल भी खड़े करती है।

  • उम्मीदवारों के नाम केवल राज्य की भाषा में होते हैं
  • एक मशीन अधिकतम 3840 वोट रिकॉर्ड कर सकती है
  • अधिकतम 64 उम्मीदवार ही फीड किए जा सकते हैं

लेकिन इन नुकसानों को विशेषज्ञ चुनाव के लिए परेशानी नहीं मानते है, क्योंकि इन कमियों से चुनाव की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ता है।

कीमत और लाइफ: कितना टिकाऊ है ये सिस्टम?

जब 1989 में EVM आया था तब इसकी कीमत 5,500 रुपये रखी गई थी, जिसको आज के समय में बढ़ाकर लगभग 50,000 रुपये से ज्यादा का कर दिया गया है। वहीं इसके इस्तेमाल के बाद की शेल्फ लाइफ करीब 15 साल बताई जाती है, जिसका सीधा मतलब है कि पैसे लगाने पर भी लंबे समय तक भरोसेमंद इस्तेमाल का वादा मिलता है।

ध्यान देने वाली बात

EVM के आने के बाद से भारत की चुनावी व्यवस्था को आधुनिक, तेज और अधिक सुरक्षित बनाया गया है। जिससे पहला यह है कि धांधली पर लगाम लगी है, दूसरी ओर पारदर्शिता को भी मजबूत किया गया है। लेकिन इसतकनीक के आने के बाद से ही बहसें आज भी जारी हैं की यहां कितना सुरक्षित है। लेकिन इसमें एक बात तो साफ है कि EVM ने चुनावी सिस्टम में बड़ा बदलाव करते हुए भारत में चुनाव की तस्वीर को बदल दिया है।

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