New Technology For Environmental Pollution Control With Coal: अब तक कोयला खदानों से निकलने वाले 'कोल गैंग्यू' को सिर्फ एक बेकार ठोस कचरा माना जाता था। इसे या तो खदानों के बाहर बड़े-बड़े ढेरों में फेंक दिया जाता था या फिर सस्ती भराव सामग्री के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता था। लेकिन अब एक नई वैज्ञानिक रिव्यू स्टडी ने इस कचरे को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह कचरा औद्योगिक गंदे पानी को साफ करने वाला एक असरदार कैटेलिस्ट बन सकता है।
वैज्ञानिकों के अध्ययन में बताया गया है कि अगर कोल गैंग्यू को प्रोसेस किया जाए, तो यह पेरॉक्सीमोनोसल्फेट (PMS) नाम के बेहद शक्तिशाली ऑक्सीडेंट को एक्टिवेट कर सकता है। यह पीएमएस पानी में मौजूद ऐसे खतरनाक रसायनों को भी तोड़ सकता है, जिन्हें आम जल शोधन तकनीकों से हटाना नामुमकिन होता है। अध्ययनकर्ता और लेखक लिक्सिन ली से मिली जानकारी के अनुसार, कोल गैंग्यू को सिर्फ एक निष्क्रिय कचरा नहीं समझना चाहिए। इसकी प्राकृतिक खनिज संरचना रासायनिक प्रतिक्रियाओं में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आपने देखा होगा कि कोयला खनन के दौरान बड़ी मात्रा में निकलने वाला यह कचरा खुले में पड़े रहने पर भारी प्रदूषण फैलाता है। यह जमीन घेरता है, मिट्टी का कटाव बढ़ाता है और इससे निकलने वाले अम्लीय पदार्थ तथा धातुएं आसपास के पानी व जमीन को जहरीला बना देते हैं। हालांकि, इसी कचरे के अंदर सिलिका, एल्यूमिना, लोहा और कई सूक्ष्म धातुएं भी पाई जाती हैं। अगर इस पर गर्मी, ग्राइंडिंग और रासायनिक उपचार जैसे तरीके अपनाए जाएं, तो इसकी अंदरूनी संरचना बदल जाती है और यह एक बेहतरीन कैटेलिस्ट के रूप में काम करने लगता है।
रिसर्च में पता चला है कि जब प्रोसेस किया गया कोल गैंग्यू पीएमएस के साथ मिलता है, तो यह पानी में सल्फेट और हाइड्रॉक्सिल जैसे बेहद सक्रिय रासायनिक कण पैदा करता है। ये कण पानी में मौजूद जहरीले रसायनों और एंटीबायोटिक्स (जैसे टेट्रासाइक्लिन और फिनॉलिक यौगिकों) को तोड़कर पूरी तरह नुकसानरहित बना देते हैं। रिसर्च में यह भी देखा गया है कि कैटेलिस्ट की पिसाई से इसके कण बेहद छोटे हो जाते हैं, जिससे इसकी सतह बढ़ जाती है और रासायनिक प्रतिक्रिया कई गुना तेज हो जाती है।
वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया है कि इस तकनीक का सिर्फ प्रयोगशाला में सफल होना ही काफी नहीं है। किसी भी तकनीक को असली मायने में उपयोगी तभी माना जाएगा, जब इसका सफल परीक्षण फैक्ट्रियों से निकलने वाले असली गंदे पानी पर किया जाए। साथ ही यह भी देखना होगा कि इस कैटेलिस्ट को कितनी बार इस्तेमाल किया जा सकता है, इसकी लागत कितनी आती है और यह प्रक्रिया कितनी सुरक्षित है। अगर इन सभी कसौटियों पर यह खरा उतरता है, तो यह कोयला खदानों के कचरे और पानी के प्रदूषण जैसी दोनों समस्याओं का एक साथ खात्मा कर सकता है।