पीने के पानी में 'अदृश्य खतरा': मानसून में जल प्रदूषण और स्वास्थ्य सुरक्षा पर विशेष रिपोर्ट

Monsoon Drinking Water Quality: मानसून के दौरान पेयजल में जीवाणु जनित और रासायनिक प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। कई बार ये जानलेवा हो जाता है। जानिए जल सुरक्षा और शुद्धिकरण के उपाय।
Monsoon Drinking Water Quality
मानसून में सुरक्षित जल के लिए आवश्यक उपाय (प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स-AI)
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Monsoon Drinking Water: मानसून के आगमन के साथ ही भारत के विभिन्न शहरों और ग्रामीण इलाकों में जलभराव, यातायात में व्यवधान और मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, इस मौसम से जुड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक सबसे महत्वपूर्ण और 'अदृश्य' जोखिम अक्सर नजरअंदाज हो जाता है और वह है हमारे पीने के पानी की बदलती गुणवत्ता। यूरेका फोर्ब्स लिमिटेड के चीफ वॉटर साइंटिस्ट डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, मानसून केवल मौसम की स्थिति नहीं बदलता, बल्कि हमारे घरों तक पहुँचने वाले पानी के रासायनिक और जैविक संतुलन को भी प्रभावित करता है।

संसद में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा साझा किए गए हालिया आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पाँच वर्षों में देशभर में 3.27 करोड़ से अधिक पेयजल नमूनों की जाँच की गई। इनमें से 14.51 लाख नमूने रासायनिक संदूषण से प्रभावित पाए गए, जबकि 11.74 लाख नमूनों में खतरनाक जीवाणुजनित (बैक्टेरियोलॉजिकल) संदूषण पाया गया। जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पुराने पड़ते बुनियादी ढांचे के इस दौर में, पेयजल सुरक्षा को मानसून की तैयारियों का मुख्य हिस्सा बनाना अनिवार्य हो गया है।

बारिश के कारण जल प्रणालियों पर बढ़ता दबाव और अदृश्य जोखिम

भारी वर्षा के कारण शहरों की जल आपूर्ति से जुड़े बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। जलभराव वाली सड़कें और उफनती नालियों के कारण पुराने या क्षतिग्रस्त पाइपों से दूषित तत्व पेयजल नेटवर्क में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। कई भारतीय शहरों में पेयजल और सीवर लाइनें समानांतर चलती हैं, जिससे पाइपलाइनों में रिसाव के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन (दोहरे संदूषण) का खतरा काफी बढ़ जाता है।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, भारी धातुएं, कीटनाशक और घुले हुए प्रदूषक हमेशा पानी का रंग, गंध या स्वाद नहीं बदलते। साफ दिखने वाला पानी भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। इसके अलावा, देश की एक बड़ी आबादी भूजल पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार, मानसून में भूजल पुनर्भरण के दौरान स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट जैसे प्राकृतिक दूषित तत्वों का स्तर भी बदल जाता है।

जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और घरेलू स्तर पर द्वितीयक संदूषण

जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं आम हो गई हैं, जिससे सीवर ओवरफ्लो और जल निकासी प्रणालियों के ठप होने का जोखिम बढ़ गया है। वहीं दूसरी ओर, तेजी से बढ़ रही शहरी आबादी का दबाव उन पुरानी जल वितरण प्रणालियों पर पड़ रहा है, जिन्हें इस क्षमता के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। यह स्थिति केवल सरकारी बुनियादी ढांचे की चुनौती नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी सतर्कता की मांग करती है।

घरों में लगी ओवरहेड टंकियों, भूमिगत जलाशयों और जल भंडारण बर्तनों की नियमित सफाई न होने पर 'द्वितीयक संदूषण' का खतरा बना रहता है। इसी प्रकार, जल शुद्धिकरण प्रणालियों (Water Purifiers) की समय पर सर्विसिंग और उनके फिल्ट्रेशन सिस्टम की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि वे नए उभरते प्रदूषकों जैसे माइक्रोप्लास्टिक, भारी धातुओं और कीटनाशकों के अवशेषों को प्रभावी ढंग से छान सकें।

निवारक स्वास्थ्य देखभाल और जल सुरक्षा का भविष्य

भारत ने जल उपलब्धता बढ़ाने के क्षेत्र में सराहनीय प्रगति की है, लेकिन अब ध्यान जल की 'सुरक्षा और निरंतर गुणवत्ता' पर केंद्रित करने की आवश्यकता है। जल सुरक्षा को केवल किसी बीमारी का प्रकोप फैलने के बाद चिंता का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि इसे निवारक स्वास्थ्य देखभाल (Preventive Healthcare) और जलवायु अनुकूलन क्षमता के प्राथमिक घटक के रूप में देखा जाना चाहिए।

सुरक्षित पेयजल की आवश्यकता केवल मानसून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे वर्ष की बुनियादी जरूरत है। जल गुणवत्ता की सुदृढ़ निगरानी, वितरण बुनियादी ढांचे का समय पर रखरखाव, वैज्ञानिक नवाचारों का समावेश और जन-जागरूकता ही वह रास्ता है जिससे हर घर तक पहुंचने वाली पानी की हर बूंद को सुरक्षित बनाया जा सकता है। यह न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करेगा, बल्कि करोड़ों भारतीयों के बेहतर जीवन में एक दूरदर्शी निवेश साबित होगा।

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