India Bribe Register: भारत में सरकारी काम के लिए रिश्वत मांगने की शिकायतें अक्सर सुनने को मिलती हैं लेकिन इनके व्यवस्थित और सार्वजनिक आंकड़े आसानी से उपलब्ध नहीं होते। नाम सामने आने का डर भी कई लोगों को शिकायत करने से रोकता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के स्टूडेंट आर्यन निषाद ने bribes.fyi नाम का प्लेटफॉर्म तैयार किया है। वहीं इसका मकसद लोगों को रिश्वत से जुड़े अपने अनुभव गुमनाम तरीके से दर्ज करने और उनके आंकड़ों की तस्वीर सामने लाने का मौका देना है।
bribes.fyi के बारे में बताए तो यह खुद को भारत का क्राउडसोर्स्ड रिश्वत रजिस्टर बताता है। यहां किसी सरकारी विभाग या सेवा से जुड़े अनुभव को दर्ज करने के लिए अकाउंट बनाने की जरूरत नहीं बताई गई है। वहीं यूजर विभाग, रकम और घटना से संबंधित जानकारी साझा कर सकता है।
इसमें खास बात यह है कि सिर्फ रिश्वत देने की घटनाएं ही दर्ज नहीं की जा सकतीं है। अगर किसी व्यक्ति ने रिश्वत देने से इनकार किया और इसके बावजूद उसका सरकारी काम हो गया तो उस अनुभव को भी रिपोर्ट किया जा सकता है। इससे रिश्वत से इनकार करने के बाद होने वाले व्यवहार को समझने की कोशिश की जा सकती है।
इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य सिर्फ शिकायतों का संग्रह करना नहीं है। इसमें राज्य, शहर और सरकारी विभाग के आधार पर रिपोर्ट देखने और तुलना करने की सुविधा दी गई है। वहीं इस वेबसाइट पर लाइव रिपोर्ट्स, ट्रांसपेरेंसी मैप और स्टेट रजिस्ट्री लेजर जैसे सेक्शन भी मौजूद हैं। इसके साथ ही Bribe Of The Week के जरिए यूजर्स अपने अनुभव साझा कर सकते हैं। रिपोर्टिंग प्रक्रिया को आसान रखने का दावा किया गया है और वेबसाइट के मुताबिक, करीब 60 सेकंड में रिपोर्ट दर्ज की जा सकती है।
ऐसे प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी ताकत और चुनौती दोनों गुमनामी हैं। bribes.fyi के मुताबिक रिपोर्ट करने के लिए नाम या अकाउंट की जरूरत नहीं है। रिपोर्ट सार्वजनिक करने से पहले उसकी जांच की व्यवस्था होने की बात भी कही गई है। लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर झूठी या गलत जानकारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। किसी राज्य या शहर से ज्यादा रिपोर्ट आने का मतलब यह जरूरी नहीं कि वहां रिश्वतखोरी सबसे ज्यादा है। संभव है कि वहां के लोग ज्यादा सक्रिय होकर रिपोर्ट कर रहे हों।
इसलिए इन आंकड़ों को सरकारी जांच या अदालत के फैसले के बराबर नहीं माना जा सकता। फिर भी आर्यन निषाद का यह प्रयोग एक अहम सवाल जरूर उठाता है अगर रोजमर्रा की रिश्वतखोरी को आंकड़ों में दर्ज किया जाए तो क्या उसकी असली तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई दे सकती है?