ईरान युद्ध असर पर्यटन( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
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नवभारत विशेष: युद्ध के धमाकों से डूबा विश्व पर्यटन उद्योग, दुबई में भी जमकर सन्नाटा पसरा

Middle East Tourism Impact: ईरान संघर्ष के कारण खाड़ी और भारत सहित कई देशों का पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। धार्मिक, मेडिकल और अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर इसका बड़ा असर पड़ा है।

अंकिता पटेल

Iran War Tourism Loss: ईरान के खिलाफ अमेरिका व इजराइल के हमले के चीच पर्यटन की दुनिया मिसाइलों तथा बमों से इस कदर झुलस गई कि उसे पटरी पर आने में कम से कम एक साल तो लगेगा ही।

भारत का पर्यटन उद्योग ही प्रभावित हुआ है, ऐसा नहीं है। दुबई, अमेरिका, सऊदी अरब, कतर, ओमान, बहरीन, कुवैत ऐसे खाड़ी देश हैं, जहां पर खासा नुकसान हुआ है।

ईरान का पर्यटन उद्योग तो चौपट ही हो गया है। इसके साथ ही वह देश जो इन देशों के आसपास या इनकी वायुसीमा मार्ग में आते हैं, वे भी युद्ध की आग में झुलस गए हैं।

धार्मिक पर्यटन के साथ ही उन देशों को भी हानि हुई है जहां पर मेडिकल टूरिज्म या वॉटर टूरिज्म के लिए पर्यटक जाते थे। भारत में अप्रैल से लेकर अगस्त तक धार्मिक टूरिज्म का जबर्दस्त सीजन होता है। यहां पर चारधाम यात्रा के साथ ही दूसरी यात्राएं होती हैं।

दूसरे देशों से हजारों मरीज अपना उपचार कराने आते हैं और यहां पर्यटन का भी आनंद लेते हैं। यूक्रेन रूस के युद्ध के कारण वहां का पर्यटन और एजुकेशन टूरिज्म तो पहले ही से गंभीर संकट में था। अब खाड़ी युद्ध ने स्थितियां और विकट कर दी हैं। खाड़ी युद्ध का सबसे बुरा असर दुबई पर हुआ है।

यहां पर हर वर्ष कम से कम 15 मिलियन पर्यटक जाते थे, लेकिन अब यहां पर सन्नाटा नजर आ रहा है। एयर ट्रैफिक रुकने के कारण यहां पर 50 प्रतिशत से अधिक पर्यटन स्थल पर सन्नाटा है और युद्ध के 40 दिनों में दो लाख से अधिक की बुकिंग रद्द हुई हैं।

अभी जो दो हफ्ते का युद्ध विराम है, वह भी पर्यटकों में उत्साह नहीं ला पा रहा है। डर इस बात का है कि कहीं युद्ध फिर भड़का तो क्या होगा? इन परिस्थितियों में कोई भी पर्यटक या पर्यटन एजेंसी खतरा नहीं लेना चाहती।

टूरिज्म विशेषज्ञ समझ रहे हैं कि यदि युद्ध समाप्त घोषित नहीं होता है तो खाड़ी देशों को कम से कम 40 से 55 अरब डॉलर तक का नुकसान उठाना पड़ेगा। सर्वाधिक मारामारी ईंधन की है और भारत ही नहीं सभी देशों पर इसका सीधा असर आया है, जिससे हवाई किराए में उछाल आया है।

छोटी से छोटी हवाई यात्रा के टिकट में कई हजार रुपए की वृद्धि दिख रही है। श्रीलंका जैसा देश जहां पर पर्यटक हनीमून के साथ ही भगवान राम से जुड़े तीर्थों को भी देखने जाते थे, वहां मार्च माह में करीब 18 प्रतिशत की कमी हुई है।

यह यहां की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है। दुबई, श्रीलंका की बात जानें दें, भारत को देखें। यहां पर पर्यटन सीजन आरंभ हो चुका है और जून में जब मानसून आ जाएगा तब तक का जो सीजन है वह काफी डिस्टर्ब हो गया है।

इस बार गैस की किल्लत ने होटल डाबों को ही नहीं उन लोगों को भी चिंता में डाल दिया है, जो उत्तराखंड चारधाम तथा आदि कैलाश यात्रा के लिए जाते थे। सरकारी सूचना के अनुसार रजिस्ट्रेशन की संख्या में 40 प्रतिशत की गिरावट है।

वर्ष 2025 में जब यह रजिस्ट्रेशन 17 लाख थे, तो अब 10 अप्रैल को यह 14 लाख पर ही सिमट गए हैं। भारत में गत वर्ष कश्मीर में पहलगाम के बाद जिस तरह की स्थितियां थीं अब पूरे विश्व में वहीं हालात हैं।

पर्यटक और पयर्टन कारोबारी इस बात पर विश्वास कर ही नहीं पा रहे हैं कि युद्ध पूरी तरह से थम गया है। इसके पीछे कारण ट्रंप का बात पलटने में महारथ हासिल कर लेना माना जा रहा है।

पर्यटक इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि युद्ध काल में जब भारत से बाहर रहने वाले भारतीय जो भारत वापस आना चाहते थे वह चाहकर भी नहीं आ पाए थे।

दुबई में भी जमकर सन्नाटा पसरा

फिर अगर वह पर्यटन के दौरान फंस गए तो क्या होगा? भारत में आगरा, जयपुर, दिल्ली जैसे शहरों में जहां पर विदेशी पर्यटक हमेशा आते थे, वहां पर भी पर्यटकों का टोटा है और होटल, ट्रैवल एजेंसियों में फांका मारने जैसी स्थिति है।

कश्मीर, नार्थ ईस्ट, लेह-लद्दाख, नैनीताल, मनाली, शिमला जैसे शहर जो गर्मियों के लिए अप्रैल में ही बुकिंग के कारण उफनाने लगते थे, वहां लगभग नो लॉस, नो प्रॉफिट पर पर्यटकों को पैकेज उपलब्ध हैं और कई स्थान पर तो टूरिज्म एजेंसियां नाम मात्र की बुकिंग राशि में ही मान रही हैं। दुबई के लिए जो पर्यटक जाने को बेताब रहते थे वह भी इस बात से बच रहे हैं कि यहां पर क्या देख पाएंगे ?

लेख-मनोज वाणैय के द्वारा

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