नवभारत विशेष

व्यर्थ की खटपट किसलिए क्यों ढूंढे जा रहे हैं रामसेतु के सबूत?

वैष्णवी वंजारी

देश का प्राचीन गौरव, सभ्यता-संस्कृति दुनिया को दिखाने और भारत को विश्वगुरू साबित करने के फेर में सरकार कुछ ऐसे कदम उठाती है जिनका वर्तमान चुनौतियों और समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है. रामायण जैसे महाकाव्य में वर्णित रामसेतु को इस समय खोजने और प्रमाणित करने की क्या आवश्यकता है? भगवान राम त्रेतायुग में हुए. त्रेता के बाद श्रीकृष्ण का द्वापर युग आया और अभी कलियुग के प्रथम चरण के 5,500 वर्ष बीते हैं. रामायण-महाभारत को पढ़ लेना अलग बात है, उसकी रिसर्च करने और पहले से तय निष्कर्ष के प्रमाण जुटाने की अंधी दौड़ में मोटी रकम खर्च करना और समय नष्ट करना कहां तक उचित है? समय के साथ चीजें लुप्त हो जाती हैं. भूकंप, बाढ़, तूफान तथा प्राकृतिक आपदाओं से काफी परिवर्तन आ जाता है.

इसलिए सब कुछ वैसा नहीं मिल सकता जैसा हजारों-लाखों वर्ष पहले रहा होगा. भगवान कृष्ण की वैभवशाली नगरी द्वारका समुद्र में समा गई थी लेकिन इसके बाद भी मरीन आर्कियालाजी से उसकी खोज करने का प्रयास किया गया. पुराणों को इतिहास के रूप में लेने से तर्क-वितर्क भी बढ़ते हैं. कुरूक्षेत्र का छोटा मैदान देखते हुए शंकालु लोग कहते हैं कि यहां महाभारत युद्ध 18 अक्षौहिणी सेना कैसे लड़ी होंगी? रामायण के अनुसार नल और नील नामक 2 वानर भाइयों ने जो उस समय के इंजीनियर रहे होंगे, रामसेतु बनवाया जो भारत से लंका को जोड़ता था. इसके निर्माण के लिए वानरों ने बड़ी-बड़ी चट्टानों और वृक्षों को डालकर समुद्र को पाट दिया था. यह भी मान्यता है कि राम नाम लिखने से पत्थर समुद्र में तैरने लगे थे.

स्पेस मिनिस्टर जितेंद्र सिंह ने बीजेपी सांसद कार्तिकेय शर्मा के प्रश्न का जवाब देते हुए राज्यसभा में बताया कि जिस जगह पौराणिक रामसेतु होने का अनुमान लगाया जाता है वहां की सैटेलाइट तस्वीरें ली गई हैं. वहां आइलैंड (द्वीप) और चूने की उथली चट्टानों की चेन है. यह नहीं कहा जा सकता कि यह पुल का हिस्सा या अवशेष है. स्पेस डिपार्टमेंट इस काम में लगा है लेकिन इसके रामसेतु होने के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं. इसे भारत में राम सेतु और दुनिया भर में एडम्स ब्रिज या आदम का पुल कहते हैं.

कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में अर्थात 600 वर्ष पूर्व इस ढांचे पर चलकर लोग रामेश्वरम से मन्नार तक जाते थे. तूफान ने समुद्र को कुछ गहरा कर दिया जिसके बाद यह पुल समुद्र में डूब गया. मालवाही जहाजों को बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने के लिए चक्कर न लगाना पड़े इसलिए यहां समुद्र गहरा करने की योजना थी लेकिन लोगों के भावनात्मक विरोध के कारण यह काम आगे नहीं बढ़ाया जा सका.

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