TMC BJP Bengal Campaign War: अब जबकि बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए महज 3 दिन बाकी हैं, तो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच पहले चरण का चुनाव प्रचार आक्रामकता के क्लाइमेक्स को छू रहा है।
जहां पहले दौर के वोटिंग के 4 दिन पहले बंगाल में ईडी के छापे पड़े हैं और एक बिजनेसमैन गिरफ्तार हो चुका है, जबकि कोलकाता के डिप्टी पुलिस कमिश्नर शांतनु सिन्हा विधास अपने घर में नहीं मिले, इसलिए उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
शांतनु मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सिक्योरिटी चीफ भी हैं, इसलिए दीदी ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह मेरे सिक्योरिटी चोफ को गिरफ्तार करके मेरी हत्या करवाना चाहती है ताकि चुनाव जीत सके।
लेकिन ममता बनर्जी के मुताबिक, 'हम इस तरह के छापों से नहीं डरते, बंगाल एकजुट है और भाजपा को मुंह की खानी पड़ेगी' जबकि दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी पर जंगलराज का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने महिला आरक्षण पर जो अड़ंगा लगाया है, उसकी सजा बंगाल की महिलाएं टीएमसी को जरूर देंगी।
बंगाल एक उबलता हुआ रणक्षेत्र बन चुका है। जहां शब्द, अब हथियार हैं। मंच, मोर्चा है और हर एक रैली निर्णायक टकराव का ट्रेलर बनती दिखाई दे रही है।
क्या ममता तीसरी बार सत्ता में लौट रही हैं या फिर यह अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए जानबूझकर दिखाई जा रही आक्रामकता है? बंगाल में वैसे भी चुनाव बेहद संवेदनशील राजनीतिक गतिविधि हैं। यहां की राजनीति में हमेशा हिंसा और दबाव का बोलबाला रहा है।
ऐसे में पहले दौर के चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में यदि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सत्ता के ख्वाब अपने कार्यकर्ताओं को दिखा रही हैं और भाजपा के मुख्य चुनाव प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सब कुछ दांव पर लगाकर आक्रामकता का दामन थाम रहे हैं।
राजनीति में वही बाजी मारता है, जो राजनीति में नैरेटिव सेट करता है। ममता बनर्जी जब आक्रामक प्रचार पर उतरती हैं, तो न केवल मीडिया और जनता का बल्कि सबसे ज्यादा अपने समर्पित कार्यकर्ताओं का ध्यान खींचती हैं।
इसलिए वे चुनाव के इस स्तर पर पहुंच जाने के बाद 'स्थानीय बनाम बाहरी' और 'बंगाल की अस्मिता' जैसे नैरेटिव को ट्रेंड में ढालने की कोशिश कर रही हैं। यही वह रणनीति थी, जो 2021 के चुनाव में बेहद फायदेमंद साबित हुई थी।
अगर जमीन पर चुनौती बहुत कड़ी न होती, तो शायद ममता बनर्जी इस कदर आक्रामक न होतीं। यही बात भाजपा पर लागू होती है। अगर कांटे की टक्कर का एहसास न हो रहा होता, तो प्रधानमंत्री को वैश्विक संकट के बीच एक राज्य विधानसभा चुनाव में अपने को फोकस न करना पड़ता।
बंगाल के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दीदी बंगाल में तीसरी बार सत्ता में लौट रही हैं? और वास्तविकता यही है कि अब जबकि पहले दौर के चुनाव को 72 घंटों से भी कम का समय बचा है।
यह तय नहीं दिख रहा कि कोई एक पार्टी या पक्ष सुनिश्चित जीत की तरफ बढ़ रहा है, चाहे वह टीएमसी हो या भाजपा। ममता दीदी की मजबूत क्षेत्रीय पहचान भाजपा पर हर हाल में भारी पड़ रही है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा प्रदेश में लागू की गई कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिनके केंद्र में मतदाता हैं और वह महिलाओं की पहली पसंद हैं। ममता बनर्जी कोशिश कर रही हैं कि आक्रामक प्रचार के जरिए उन्हें बंगाली जनभावनाओं का संरक्षण समझा जाए और इस तरह वह इसे चुनावी मत के रूप में भुना लें।
बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही यह आभास दे रहे हैं कि वह सरकार बनाने जा रहे हैं, लेकिन किसी एक के लिए यह सपना तब तक संभव नहीं लगता, जब तक उनके पास एक सक्षम बूथ मैनेजमेंट न हो।
ग्रामीण बनाम शहरी वोटिंग के ट्रेंड की मेजॉरिटी उनके पक्ष में न हो और महिला तथा युवा वोटरों की सहानुभूति न हासिल हो। पहले चरण के चुनाव के आखिरी दिनों में दोनों ही मजबूत दावेदार आक्रामक चुनाव प्रचार का दामन थामे हुए हैं।
'हम इस तरह के छापों से नहीं डरते, बंगाल एकजुट है और भाजपा को मुंह की खानी पड़ेगी', जबकि दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनावी प्रचार में ममता बनर्जी पर जंगलराज का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने महिला आरक्षण पर जो अड़ंगा लगाया है, उसकी सजा बंगाल की महिलाएं टीएमसी को जरूर देंगी।
लेख- वीना गौतम के द्वारा