रानी दुर्गावती डिजाइन फोटो
नवभारत विशेष

वीरांगना रानी दुर्गावती की ये बातें आज भी युवा पीढ़ी को देती हैं प्रेरणा, गोंडवाना में चर्चित हैं ये किस्से

Rani Durgavati: गोंडवाना की महारानी दुर्गावती का जीवन साहस, स्वाभिमान और देशभक्ति की अमर मिसाल है। मुगलों की विशाल सेना के आगे झुकने की बजाय अंतिम सांस तक लड़ने वाली इस वीरांगना की शौर्य गाथा।

विजय कुमार तिवारी, अंकिता पटेल

Tales of Rani Durgavati: रानी दुर्गावती बुंदेलखंड और गोंडवाना साम्राज्य की वह महान वीरांगना थीं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान और देशभक्ति की अद्वितीय मिसाल है। रानी दुर्गावती का जीवन हमें सिखाता है कि वीरता किसी लिंग या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती। उनका नाम इतिहास में एक ऐसी 'शेरनी' के रूप में दर्ज है, जिसने कभी झुकना नहीं सीखा।

उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे प्रेरक किस्से हैं, जो आज भी हर पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। आइए डालते हैं इन पर एक नजर...

तीर-तलवार में चलाने में निपुण

रानी दुर्गावती का जन्म 1524 में कालिंजर के राजा कीरत राय के यहाँ दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था। इसीलिए इनका नाम दुर्गावती रखा गया। अपने नाम के अनुरूप ही उनमें बचपन से ही युद्ध कौशल के प्रति गहरा आकर्षण था। उन्होंने बचपन में ही तीरंदाजी, घुड़सवारी और तलवारबाजी सीख ली थी। वे अपने पिता के साथ शिकार पर जाती थीं। कहा जाता है कि जब भी उन्हें किसी आदमखोर शेर का पता चलता, वे उसका शिकार किए बिना पानी भी नहीं पीती थीं।

प्रेरणा: यह किस्सा सिखाता है कि अपनी क्षमताओं को बचपन से ही निखारना चाहिए और चुनौतियों का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

रानी दुर्गावती

एक कुशल शासक और प्रजा का कल्याण

पति दलपत शाह के निधन के बाद उनका बेटा वीरनारायण बहुत छोटा था। ऐसे में रानी ने खुद गोंडवाना (गढ़ा-कटंगा) की कमान संभाली। उन्होंने अपने शासनकाल में प्रजा के कल्याण के लिए कई काम किए। उन्होंने अनेक मठ, कुएं, बावड़ियां और विशाल तालाब बनवाए, जिनमें जबलपुर का चेरीताल और रानीताल आज भी प्रसिद्ध हैं। उनके राज्य में प्रजा इतनी समृद्ध थी कि लोग लगान सोने के सिक्कों और हाथियों से चुकाते थे।

प्रेरणा: एक सच्चा नेतृत्वकर्ता वही है जो संकट के समय जिम्मेदारी संभाले और अपनी प्रजा या टीम के कल्याण को सर्वोपरि रखे।

मालवा के शासक बाज बहादुर को दी पटखनी

गोंडवाना की समृद्धि को देखकर मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने वहां कब्जा करने के लिए हमला कर दिया। रानी दुर्गावती ने इस युद्ध में अभूतपूर्व वीरता दिखाई। उन्होंने अपनी सेना का ऐसा नेतृत्व किया कि बाज बहादुर को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। बाज बहादुर ने दोबारा भारी सेना के साथ हमला किया, लेकिन रानी ने उसे फिर से बुरी तरह पराजित किया। इस जीत के बाद रानी दुर्गावती का खौफ दुश्मनों के दिलों में बैठ गया।

प्रेरणा: दुश्मन कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर हौसले बुलंद हों और रणनीति सही हो, तो जीत निश्चित होती है।

रानी दुर्गावती

अकबर की विशाल सेना से टक्कर

मुगल सम्राट अकबर रानी दुर्गावती के राज्य को अपने अधीन करना चाहता था। उसने आसफ खान के नेतृत्व में एक विशाल सेना गोंडवाना पर हमला करने के लिए भेजी। रानी के सलाहकारों ने मुगलों की विशाल सेना को देखकर उन्हें आत्मसमर्पण करने या संधि करने की सलाह दी। लेकिन रानी ने कहा, "कलंकित जीवन जीने से बेहतर है, सम्मान के साथ मर जाना।" रानी ने युद्ध के मैदान में मुगलों के दांत खट्टे कर दिए और तीन बार मुगलों की सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया।

प्रेरणा: यह किस्सा हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कभी अपने आत्मसम्मान और सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए।

अंतिम सांस तक दिखाया अपना स्वाभिमान

युद्ध के आखिरी दिन रानी दुर्गावती खुद सैनिक भेष में अपने हाथी 'सरमन' पर सवार होकर युद्ध लड़ रही थीं। वे मुगलों पर भारी पड़ रही थीं, तभी एक तीर उनकी आंख में और दूसरा उनकी गर्दन पर लगा। रानी समझ गईं कि अब उनका जीतना असंभव है और घायल अवस्था में मुगल सैनिक उन्हें बंदी बना सकते हैं। उन्होंने अपने सेनापति से कहा कि वे उनकी जान ले लें, लेकिन सेनापति ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब रानी ने अपनी ही कटार अपने सीने में घोंप ली और 24 जून 1564 को वीरगति प्राप्त की।

प्रेरणा: रानी का यह सर्वोच्च बलिदान सिखाता है कि पराधीनता या गुलामी स्वीकार करने से कहीं बेहतर सम्मानजनक मृत्यु है।

रानी दुर्गावती

आपको बता दें कि महारानी दुर्गावती का जन्म महोबा के चंदेल शासक राजा कीर्ति सिंह (कीरत राय) के यहाँ हुआ था। चंदेल वंश को क्षत्रिय और राजपूत कुल का माना जाता है। वर्ष 1542 में उनका विवाह गोंड राजवंश के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह के साथ हुआ। विवाह के तीन वर्ष बाद, 1545 में उन्होंने पुत्र वीर नारायण को जन्म दिया।

वर्ष 1550 में राजा दलपत शाह के असामयिक निधन के बाद रानी दुर्गावती पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपने मात्र पाँच वर्ष के पुत्र वीर नारायण को गढ़ा-मंडला (गोंडवाना) का राजा बनाकर खुद उनकी संरक्षिका के रूप में शासन की बागडोर संभाल ली। रानी ने अपने राज्य को न केवल समृद्ध बनाया, बल्कि अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहीं।

मुगल सम्राट अकबर गोंडवाना राज्य को अपने अधीन करना चाहता था, जिसके लिए उसने अपने सेनापति आसफ खान को आक्रमण का जिम्मा सौंपा। 24 जून 1564 को रानी दुर्गावती ने पुरुष वेश धारण कर अपनी सेना का नेतृत्व किया और जबलपुर के पास नर्रई नाला (नाराई घाट) में मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया।

युद्ध के दौरान रानी की गर्दन और कंधे पर तीर लग गए, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। जब उन्हें लगा कि वे शत्रुओं द्वारा बंदी बनाई जा सकती हैं, तो उन्होंने अपमानजनक कैद स्वीकार करने के बजाय अपनी ही कटार अपने सीने में उतार ली और वीरगति प्राप्त की।

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