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नवभारत विशेष: रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, अमेरिका के नए कानून को समझिए

Russia Sanctions Bill: अमेरिका के रूस प्रतिबंध कानून से भारत पर 100% तक टैरिफ का खतरा बढ़ा है। भारत ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के आधार पर रूसी तेल खरीद पर अपना रुख बनाए हुए है।

अंकिता पटेल

India Russian Oil Tariff: आखिरकार अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव ने भी 262-159 मतों से रूस के खिलाफ सैंक्शन बिल पास कर दिया। सीनेट इसे पहले ही 86-11 वोट से मंजूरी दे चुकी है। अब इसे ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए व्हाइट हाउस भेज दिया गया है, ट्रंप के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन जायेगा।

इसके बाद वह उन देशों पर रूस के साथ व्यापार करते हैं 500 फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं। फिलहाल भारत तथा और कई देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाए जाने की धमकी चर्चा में है। हालांकि भारत ने अभी तक इस धमकी पर कोई पलटवार नहीं किया, लेकिन धीमे से स्पष्ट कर दिया है कि हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं करेंगे जहां हमें सस्ता तेल मिलेगा, हम खरीदेंगे।

भारत को बेधड़क अपने इस स्टैंड पर अड़े रहना चाहिए। असली सवाल टैरिफ से ज्यादा उस कूटनीतिक खेल का है, जिसमें व्यापार, तेल और भू-राजनीति एक ही शतरंज की बिसात पर आ गए हैं। वॉशिंगटन केवल यह नहीं चाहता कि 'रूस से तेल मत खरीदिए', अमेरिका यह तय करने की कोशिश भी कर रहा है कि रूस के साथ किसी भी तरह के संबंध रखने की कीमत दुनिया के दूसरे देशों को भी चुकानी पड़े। हम रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदार हैं। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों तथा बाजार की परिस्थितियों के आधार पर रूसी तेल खरीदना बढ़ाया।

100% टैरिफ से भारत के निर्यात पर कितना असर पड़ेगा?

अमेरिका का तर्क है कि रूसी ऊर्जा खरीद से मॉस्को को राजस्व मिलता है और उस राजस्व का इस्तेमाल युद्ध के लिए किया जा सकता है। भारत का तर्क अलग है- भारत को अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और वह तेल खरीद को बाजार की परिस्थितियों तथा अलग-अलग स्रोतों के आधार पर तय करेगा।

भारत के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं- अमेरिका के साथ व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी संबंध; रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध; पश्चिम एशिया की अस्थिरता; चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा की जरूरत।

ऐसे में दिल्ली शायद सार्वजनिक टकराव के बजाय बातचीत, विकल्प और प्रतिरोध तीनों को एक साथ चलाने की रणनीति पर काम कर रही है। सवाल है आखिर 100 फीसदी टैरिफ से कितना बड़ा पहाड़ टूटेगा? यदि अमेरिका भारतीय उत्पादों पर वास्तव में 100 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाता है तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की कीमत बढ़ सकती है। इससे निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है, कुछ उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है और अमेरिकी आयातक वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर सकते हैं।

रूसी तेल और अमेरिकी दबाव के बीच भारत का संतुलन

टैरिफ का भुगतान केवल भारत नहीं करता, अमेरिकी आयातक भी ऊंची कीमत चुकाता है। अमेरिकी उपभोक्ता तक उसका असर पहुंच सकता है। कहने का मतलब 100 फीसदी टैरिफ कोई ऐसा हथियार नहीं है जिसे चलाने पर केवल निशाना घायल होता है। यही वजह है कि कानून में शक्ति होना और उसका वास्तविक इस्तेमाल होना- दो अलग-अलग बातें हैं। रूस वर्षों से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था चला रहा है।

ईरान भी लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता आया है। लेकिन भारत की स्थिति अलग है। भारत पर प्रतिबंध ज्यादा असर डालेंगे। हमारे वित्तीय लेन-देन कठिन कर देंगे, बाजार सीमित कर देंगे, तकनीक और निवेश तक पहुंच प्रभावित हो सकती है और व्यापार की लागत बढ़ सकती है।

भारत अमेरिकी बाजार से गहराई से जुड़ा है। इसलिए रूस या ईरान के अनुभव को हूबहू भारत पर लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि असली लड़ाई तेल की नहीं, विकल्पों की है। भारत के सामने विकल्प हैं- रूसी तेल पर निर्भरता का अनुपात बदलना, अन्य स्रोतों से खरीद बढ़ाना, अमेरिकी कंपनियों के साथ व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करना, द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना और जरूरत पड़ने पर अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के उपाय तलाशना।

रूसी तेल अचानक छोड़ना ऊर्जा कीमतों पर असर डाल सकता है। दिल्ली शायद एक ऐसी नीति चाहती है जिसमें न रूस पूरी तरह छूटे, न अमेरिका पूरी तरह रूठे और न भारतीय ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़े, भारत का कूटनीतिक दांव यही है।

भारत को कोई रास्ता तलाशना होगा

टैरिफ का भुगतान केवल भारत नहीं करता। अमेरिकी आयातक भी ऊंची कीमत चुकाता है। अमेरिकी उपभोक्ता तक उसका असर पहुंच सकता है। कहने का मतलब 100 फीसदी टैरिफ कोई ऐसा हथियार नहीं है जिसे चलाने पर केवल निशाना घायल होता है। यही वजह है कि कानून में शक्ति होना और उसका वास्तविक इस्तेमाल होना- दो अलग-अलग बातें हैं। रूस वर्षों से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था चला रहा है।

लेख-वीना गौतम के द्वारा

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