भारतीय सेना ने देश में ही क्यों चलाया था सैन्य अभियान? आजादी से जुड़े हैं तार, क्या है ऑपरेशन पोलो की कहानी

Operation Polo 1948: 1948 में हैदराबाद के भारत में विलय के लिए चलाए गए 'ऑपरेशन पोलो' का इतिहास जानिए। सरदार पटेल के नेतृत्व में शुरू हुई इस कार्रवाई से रियासत का एकीकरण हुआ।
Operation Polo 1948
ऑपरेशन पोलो के दौरान मार्च करती भारतीय सेना(सोर्स- सोशल मीडिया)
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Operation Polo Hyderabad History: भारत की आजादी के समय देश में मौजूद 562 रियासतों में से 559 ने भारत में शामिल होने के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए थे। हालांकि, कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद ऐसी तीन रियासतें थीं, जिन्होंने भारत सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की। जूनागढ़ फरवरी 1948 में भारत का हिस्सा बन गया, लेकिन हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने भारत में विलय से इनकार कर दिया। 

तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने हैदराबाद की स्थिति को भारत के पेट में कैंसर तक बताया था। आखिरकार 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने निजामशाही के खिलाफ ऑपरेशन पोलो शुरू किया और 17 सितंबर को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। सैन्य अभियान शुरू करने से पहले सरदार पटेल ने जनरल करियप्पा से केवल एक सवाल किया था। उनके जवाब के बाद पटेल ने पंडित नेहरू की आशंकाओं को दरकिनार करते हुए कार्रवाई का फैसला किया।

रजाकारों पर हिंदुओं के कत्लेआम का आरोप

78 साल पहले हैदराबाद का भारत में विलय और ऑपरेशन पोलो केवल सैन्य कार्रवाई भर नहीं थी, बल्कि यह आजाद भारत की राष्ट्रीय एकता और सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प से जुड़ी अहम घटना थी। निजाम की स्वतंत्र रहने की कोशिश भारत की एकता के सामने बड़ी चुनौती बन गई थी। हैदराबाद की करीब 84 प्रतिशत आबादी हिंदू थी, लेकिन निजाम के शासन में प्रशासन और सेना के अहम पदों पर मुसलमानों का प्रभाव था। निजाम के समर्थन में रजाकारों की एक सशस्त्र फौज थी, जिस पर भारत में विलय का विरोध करने और हिंसा फैलाने के आरोप लगे।

सुंदरलाल कमेटी की अप्रकाशित रिपोर्ट में इस दौरान मरने वालों की संख्या हजारों में बताई गई है। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपनी किताब 'द एंड ऑफ एन एरा, हैदराबाद मेमोरीज' में लिखा है कि हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय रोकने के लिए पाकिस्तान से सहायता मांगने की कोशिश की थी। उन्होंने जिन्ना को संदेश भेजकर यह जानना चाहा था कि क्या पाकिस्तान भारत के खिलाफ संघर्ष में हैदराबाद का समर्थन करेगा। पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइंस' में भी इस प्रसंग का उल्लेख किया है। हालांकि, जिन्ना ने निजाम के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

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हैदराबाद के चारमीनार की पुरानी तस्वीर(सोर्स- सोशल मीडिया)

नजरबंदी के बावजूद पटेल तक पहुंचती रहीं रिपोर्ट

साल 1948 में कांग्रेस नेता केएम मुंशी हैदराबाद में भारत के एजेंट-जनरल के तौर पर तैनात थे। निजाम मीर उस्मान अली खान उनके प्रति नाराजगी रखता था। राजनयिक पद पर होने के बावजूद मुंशी को वहां रहने की उचित सुविधा नहीं दी गई। निजाम के जासूस लगातार उन पर नजर रखते थे। बोलारम रेजीडेंसी में लगभग नजरबंदी जैसी परिस्थितियों में रहते हुए भी केएम मुंशी सरदार पटेल तक गुप्त रिपोर्ट और डायरी के नोट्स पहुंचाते रहे।

22 मई 1948 को गंगापुर में ट्रेन से यात्रा कर रहे हिंदुओं को रजाकारों ने निशाना बनाया। इस घटना के बाद पूरे देश में कांग्रेस सरकार के कथित नरम रुख को लेकर सवाल उठने लगे। केएम मुंशी ने अपनी किताब में लिखा है कि रजाकारों के अत्याचारों के बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद में सैन्य अभियान चलाने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि और सांप्रदायिक दंगों की आशंका को लेकर सैन्य कार्रवाई करने में संकोच कर रहे थे।

पटेल ने करियप्पा से पूछा सीधा सवाल

सरदार पटेल प्रधानमंत्री नेहरू के आकलन से सहमत नहीं थे। गृह मंत्री के तौर पर उन्होंने स्थिति का अपना आकलन किया और आगे की रणनीति पर काम किया। भारतीय सेना के पूर्व उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा ने अपनी आत्मकथा 'स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट' में सरदार पटेल और जनरल करियप्पा के बीच हुई बैठक का विस्तार से उल्लेख किया है।

पटेल ने जनरल करियप्पा को मिलने के लिए बुलाया। उस समय करियप्पा और एसके सिन्हा कश्मीर में तैनात थे। संदेश मिलते ही दोनों दिल्ली पहुंचे। करीब पांच मिनट की इस संक्षिप्त बैठक में सरदार पटेल ने जनरल करियप्पा से एक सीधा सवाल किया। उन्होंने पूछा कि अगर हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रिया आती है, तो क्या भारतीय सेना एक साथ दो मोर्चों से निपट सकती है? जनरल करियप्पा ने इसका जवाब हां में दिया। इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद में सैन्य अभियान शुरू करने का निर्णय लिया।

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हैदराबाद में निजाम के साथ सरदार पटेल(सोर्स- सोशल मीडिया)

सैन्य कार्रवाई रोकना चाहते थे नेहरू

13 सितंबर 1948 को मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में ऑपरेशन पोलो शुरू किया गया। करीब 36 हजार भारतीय सैनिक हैदराबाद में दाखिल हुए। दुर्गादास की किताब 'इंडिया फ्रॉम कर्ज़न टू नेहरू एंड आफ़्टर' के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई की जानकारी मिलते ही निजाम ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी को संदेश भेजकर अभियान रोकने की अपील की थी।

दोनों ने सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला किया। इसी दौरान जब निजाम को जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एचएम पटेल और वीपी मेनन बैठक कर रहे थे, तभी सरदार पटेल ने हैदराबाद में भारतीय सेना के प्रवेश की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि अब सैन्य अभियान को रोका नहीं जा सकता। 14 और 15 सितंबर को भारतीय सेना ने निजाम की सेना और रजाकारों से मुकाबला करते हुए नलदुर्ग और जालना जैसे शहरों पर कब्जा कर लिया।

चार महीने बाद हैदराबाद पहुंचे पटेल

ऑपरेशन पोलो के दौरान 1373 रजाकार और निजाम की सेना के 807 जवान मारे गए, जबकि भारतीय सेना के 66 जवान शहीद हुए। 16 सितंबर 1948 को हैदराबाद के प्रधानमंत्री मीर लाइक अली और उनकी पूरी कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया।

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ऑपरेशन पोलो के चार महीने बाद हैदराबाद गए थे पटेल(सोर्स- सोशल मीडिया)

इसके बाद निजाम ने हैदराबाद में भारत के एजेंट-जनरल केएम मुंशी को एक गुप्त संदेश भेजकर आत्मसमर्पण करने की इच्छा जताई। 17 सितंबर को हैदराबाद स्टेट की सेना के मेजर जनरल सैयद अहमद अल एदूर्स ने मेजर जनरल जयंत नाथ चौधरी के सामने आत्मसमर्पण की प्रक्रिया पूरी की। 18 सितंबर को ऑपरेशन पोलो का नेतृत्व करने वाले मेजर जनरल जे.एन. चौधरी को हैदराबाद का सैन्य गवर्नर नियुक्त किया गया।

हैदराबाद के भारत में विलय के करीब चार महीने बाद फरवरी 1949 में सरदार पटेल पहली बार बेगमपेट एयरपोर्ट पहुंचे। इस मौके पर हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान खुद उन्हें रिसीव करने के लिए एयरपोर्ट पर मौजूद थे।  

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