Trump Iran War Threat: उम्मीद थी कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को समाप्त करने की घोषणा करेंगे लेकिन उन्होंने केवल आत्मप्रशंसा करते हुए व्यर्थ की डोंग हांकी। महंगाई, मंदी व बेरोजगारी बढ़ानेवाले इस संहारकारी युद्ध ने विश्व में तेल-गैस का संकट पैदा कर दिया है।
इस लड़ाई को लेकर स्वयं अमेरिकी जनता की नाराजगी भी बढ़ती जा रही है। ट्रंप ने कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध व वियतनाम युद्ध की तुलना में उन्होंने सिर्फ 32 दिनों में असरदार सैनिक कार्रवाई की है।
उन्होंने कहा कि कि होमुंज की खाड़ी को खुलवाने की जिम्मेदारी अमेरिका की नहीं है। इस जलमार्ग को वह देश खुलवाए जो इसका इस्तेमाल करते हैं। एक ओर तो ट्रंप ने कहा कि इस युद्ध में अमेरिका के उद्देश्य लगभग पूरे हो गए हैं।
और लड़ाई लगभग समाप्ति की ओर है लेकिन दूसरी ओर उन्होंने यह भी धमकी दी कि यदि दो-तीन सप्ताह में ईरान युद्ध को रोक कर होर्मुज नहीं खोलता तो उस पर इतनी बमबारी की जाएगी कि वह पाषाण युग में जा पहुंचेगा।
यह युद्ध डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लादा गया ऐसा अभिशाप है जिसने अनेक देशों के लिए भीषण समस्याएं पैदा कर दी हैं। इसकी वजह से विकास दर घटी है, आयात खर्च बढ़ा है।
विमानसेवा महंगी हुई है। ईरान के पड़ोस के देशों की अर्थव्यवस्था बिगड़ी और वह भी हमलों की चपेट में आए हैं। सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, ओमान, जॉर्डन, ईरान, इराक व इजराइल में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं।
इसमें से लगभग 6 लाख कर्मचारी भारत लौट आए हैं। कंपनियों के काम बंद करने व छंटनी से लोग बेरोजगार हो गए हैं। निर्माण कार्य भी रुक गए हैं। ट्रंप के युद्धोन्माद की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी भार आया है।
अमेरिका के पास विश्व के श्रेष्ठ शस्त्र व तकनीक होने पर भी वह ईरान का मनोबल तोड़ नहीं पाया, ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनई के अलावा सारे वरिष्ठ नेता व कमांडर मारे जाने पर भी वहां की फौज व रेवोल्यूनरी गार्ड अमेरिका व इजराइल से युद्ध जारी रखे हुए हैं।
ट्रंप ने हमलों में तेजी लाने की बात कही है। इसलिए आगामी कुछ सप्ताह और भी तनावपूर्ण रह सकते हैं। ट्रंप की नाराजगी उन यूरोपीय देशों से है जिन्होंने उसे इस युद्ध में सहयोग नहीं दिया।
उनका कहना है कि ट्रंप ने उनसे पूछकर या विश्वास में लेकर यह लड़ाई शुरू नहीं की थी। ट्रंप ने नाटो संधि से भी नाता तोड़ने की बात कही है जबकि ऐसा करने से वह वैश्विक शक्ति का दर्जा खो बैठेगा, नाटो के जरिए ही उत्तरी एटलांटिक देशों में अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी व दबदबा है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा