टाइगर श्रॉफ पर हमले की जांच में अपराधियों के ‘डेड लेटर बॉक्स’ इस्तेमाल करने का खुलासा।
इस तरीके में गुप्त ठिकाने पर संदेश या सामान रखकर बिना मिले संपर्क किया जाता है।
इस पुरानी तकनीक में फोन, इंटरनेट या डिजिटल साधनों की जरूरत नहीं होती।
हमले की साजिश में तीन से अधिक लोगों के शामिल होने की आशंका।
Dead Letter Box Secret Communication Method: बॉलीवुड एक्टर टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले में जब पुलिस तथा दूसरी एजेंसियों ने जांच-पड़ताल की तो सामने आया कि अब अपराधी सुरक्षित रास्ता अपना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने 'डेड लेटर बॉक्स' का उपयोग किया। यानी एक ऐसा गुप्त स्थान या ठिकाना, जिसका इस्तेमाल 2 व्यक्तियों के बीच गुप्त संदेश, दस्तावेज या छोटी वस्तुएं पहुंचाने के लिए किया जाता है ताकि एक-दूसरे से इनके लेन-देन के लिए सीधे मिलने की जरूरत न पड़े। इस तरीके का फायदा अपराधी कैसे ले रहे हैं, सुरक्षा एजेंसियां समझ नहीं पा रही हैं।
टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले में जब पुलिस ने जांच आरंभ की तो सामने आया कि हमलावर भले ही 3 हों पर इसमें शामिल होने वाले अपराधियों की संख्या अनुमान से कहीं ज्यादा हो सकती है। पुलिस को पता चला कि हमले के लिए रणनीति बनाते समय 100 साल से अधिक पुराने तरीके 'डेड लेटर बॉक्स' तरीके का प्रयोग किया गया है। डेड लेटर बॉक्स एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें न तो किसी प्रकार की तकनीक का प्रयोग होता है, न ही इंटरनेट और न ही फोन की जरूरत पड़ती है।
सुरक्षा व्यवस्था में लगे कर्मियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग किया जाता है। डेड लेटर बॉक्स कोई नई व्यवस्था नहीं है। जब शीत युद्ध का समय था, तब इसी माध्यम का सीआईए तथा केजीबी के जासूस तक इस्तेमाल करते थे। वह इसके माध्यम से महत्वपूर्ण दस्तावेज तक बदल लेते थे। उस समय जासूस गुप्त संदेश या कागजात ऐसे स्थान पर छोड़ते थे, जहां पर लोगों की कम ही आवाजाही हो और उसे बाद में उनको पाने वाला ले जाता था। इतिहास में डेड लेटर बॉक्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश खुफिया एजेंसी तथा अमेरिकी खुफिया एजेंसी के दस्तावेजों में मिलते हैं। बाद में यह आम अपराधियों द्वारा भी प्रयोग होने लगे।
गैंगस्टर्स ही नहीं स्मगलर्स तथा दूसरे देशों में फैले अंडरवर्ल्ड डॉन तक इसका लाभ ले रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिन हथियारों से टाइगर श्रॉफ पर हमला हुआ वह इसी माध्यम से हमलावरों तक पहुंचाए गए, पुलिस विभाग में इसे 'नो कॉन्टैक्ट' व्यवस्था कहा जाता है। जब से लावारिस वस्तुओं को छूने या उठाने से जनता बचने लगी है, तब से अपराधी मैरिज गार्डन के आसपास या किसी होटल के कमरे में, पार्किंग एरिया में, पार्क में, शादी समारोह में किसी सुनसान स्थान पर अपने हथियार या नशीली वस्तुएं रख देते हैं और उसे तय व्यक्ति ले जाता है। न रखने वाले का पता चलता है, न ही उठाने वाले का। इस तरह अपराधी एक चेन के माध्यम से अपना काम करते हैं।
एआई कैमरे या दूसरे माध्यम भी यहां तक नहीं पहुंच पाते। यहां तक कि कोई शक के दायरे में भी नहीं आता। संभवतः देश में बड़े पैमाने पर मिल रहे लावारिस हथियार या नशीले पदार्थ इसी माध्यम से पहुंचाए जा रहे हैं। इसे डेड भी इसी कारण से कहा जाता है, क्योंकि इसमें कॉन्टैक्ट तो होता ही नहीं है। पुलिस के हाथ प्राथमिक अपराधी लग भी जाते हैं, तो भी वह असली अपराधियों तक पहुंचने में सफल नहीं हो पाती। आतंकवाद के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
पंजाब, जम्मू कश्मीर तथा राजस्थान की सीमाओं पर अंतरराष्ट्रीय तस्कर स्मगलर हथियारों के साथ ही नशीले पदार्थ पहुंचाने में तो इसका लाभले ही रहे हैं, पहलगाम में जो हथियार डिलीवर हुए हो सकता है, उसमें भी यही रास्ता अपनाया गया हो। मोहाली में पंजाब पुलिस के इंटेलिजेंस हेडक्वार्टर पर वर्ष 2022 में हमला हुआ था, तो उसकी जांच में पता चला था कि हथियार पहुंचाने के लिए डेड लेटर बॉक्स का इस्तेमाल हुआ था तथा सप्लायर ने एक गुप्त स्थान पर उन्हें रख दिया था, बाद में शूटरों ने उन्हें प्राप्त कर लिया था। जब शूटर या दूसरे तस्कर आदि पकड़े जाते हैं, तो वह कुछ भी नहीं बता पाते। क्योंकि वह किसी से मिले ही नहीं होते, उन्हें तो कोई अनजान व्यक्ति सूचित करता है और उसके बाद वह उनसे कभी नहीं मिलता।
टाइगर के मामले में रोज नई-नई जानकारी आना भी इस बात की गवाही देता है। ऐसा नहीं है कि पुलिस या सुरक्षा एजेंसियां इस मामले में कुछ नहीं कर पा रहीं। वह अब उन सभी डेड ड्रॉप लोकेशन, वॉट्सएप, टेलिग्राम या सिग्नल जैसे एनक्रिप्टेड एप्स पर नजर रख रही हैं, कुछ कोड व को डिकोड करने के लिए विशेषज्ञ काम कर रहे हैं तथा उन लोकेशन पर विशेष निगरानी है, जहां पर यह डेड ड्रॉप की संभावना होती है। उन मोबाइल नंबरों पर भी सर्च होता है जो हाईवे या सुनसान स्थान पर अधिक प्रयोग होते हैं।
एनआईए ने दिल्ली लालकिले के पास आतंकी घटना की जब जांच की तो उसे पता चला कि आतंकी संदेश लिखकर ड्राफ्ट फोल्डर में छोड़ देता था और दूसरा आतंकी उसे बाद मे लॉग इन करके पढ़कर मिटा देता। मतलब यह संदेश भेजे बिना काम हो रहा था।
लेख- मनोज वार्ष्णोय के द्वारा