शिक्षक अत्याचारी नहीं संवेदनशील बनें (सौ. डिजाइन फोटो) 
नवभारत विशेष

संपादकीय: शिक्षक अत्याचारी नहीं, संवेदनशील बनें

Positive Learning Environment: यह सोचना गलत है कि दंड देकर ही बच्चे को सुधारा जा सकता है। विद्यार्थी को शारीरिक पीड़ा देना अत्यंत अनुचित है। नई शिक्षा नीति में स्वायत्तता, सृजनशीलता बना सकते है।

दीपिका पाल

नवभारत डिजिटल डेस्क: जब बच्चों को पढ़ाने का तौर तरीका बदल गया है और उन्हें पीटने या शारीरिक सजा देने पर सख्त मनाही है तो वसई के प्राथमिक स्कूल की एक शिक्षिका ने 9 वर्ष की बच्ची को इतना कठोर दंड क्यों दिया कि उसकी जान चली गई। वह बच्ची देर से स्कूल आई तो निर्दयी शिक्षिका ने उसे पीठ पर बस्ता लादकर 100 बार उठक-बैठक करने की सजा दी। इस वजह से वह बुरी तरह थक कर बीमार पड़ गई। कुछ दिन अस्पताल में रहकर उसने अंतिम सांस ली। पालकों ने इस घटना की पुलिस में शिकायत की।

जांच से सारी बात सामने आएगी लेकिन जब बच्चों को एक चपत मारने से भी मना किया गया है तो शिक्षिका ने उस नन्हीं सी जान को इतनी कठोर सजा क्यों दी? बच्चों को तनावरहित वातावरण में पढ़ाना चाहिए वह समय कब का बीत गया जब कहते थे- छड़ी पड़े छमाछम, विद्या आए घमाघम! अध्यापन का तरीका वैज्ञानिक और सभ्यतापूर्ण हो चुका है। शिक्षक को बाल मनोविज्ञान आना चाहिए तभी वह बच्चों को सही तरीके से ज्ञान दे पाएगा। नन्हें बच्चे मिट्टी के लोंदे की तरह होते हैं जिन्हें जैसा चाहे आकार दिया जा सकता है। यही बच्चे आगे चलकर डाक्टर, इंजीनियर, वकील, प्राध्यापक, प्रशासक, व्यवसायी बनेंगे। उनके साथ संवेदनशीलता से पेश आना चाहिए। अनुशासन के नाम पर दंडित करने की भी एक सीमा होती है।

कभी-कभी ऐसे समाचार आते हैं जिनसे लगता है कि स्कूल हैं या यातना के केंद्र! किसी बच्चे को इतने जोर से थप्पड़ मारी गई कि कान का पर्दा फट गया। किसी को जबरन इतना व्यायाम कराया कि किड़नी खराब हो गई। हाल ही में एक नन्हीं सी छात्रा दिल्ली में स्कूल की ऊपरी मंजिल से गिर पड़ी और दम तोड़ दिया। उसे सहपाठी बहुत सताया करते थे और पालकों के कहने पर भी शिक्षक ने इस शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया था। स्कूल का वातावरण बच्चों के लिए अनुकूल व स्नेहपूर्ण होना चाहिए, आतंकित करनेवाला नहीं।

यह सोचना गलत है कि दंड देकर ही बच्चे को सुधारा जा सकता है। विद्यार्थी को शारीरिक पीड़ा देना अत्यंत अनुचित है। नई शिक्षा नीति में स्वायत्तता, सृजनशीलता, लचीलापन तथा छात्र के मौलिक गुणों का विकास करना अपेक्षित है। संवेदनशील, दयालु व सुसंस्कृत शिक्षक ही शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह सार्थक कर सकते हैं। महाराष्ट्र में साने गुरूजी का आदर्श है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गांव हो या शहर, कहीं भी शिक्षक बच्चों को शारीरिक यातना न दें।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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