प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

संपादकीय: कमजोर रुपया शेयर बाजार के लिए घातक

Stock Market Impact: डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के करीब पहुंच गया है। इससे शेयर बाजार, आयात लागत और विदेशी निवेश पर असर पड़ रहा है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।

अंकिता पटेल

नवभारत डिजिटल डेस्क: गत वर्ष डॉलर की तुलना में रुपया 6 प्रतिशत से ज्यादा नीचे गिर गया। इस नए वर्ष में भी रुपये की दुर्दशा हो रही है। सोना-चांदी की आसमान छूती कीमतों और शेयर मार्केट में गिरावट का रुपये के घटते विनिमय मूल्य से संबंध है। इस समय एक डॉलर लगभग 92 रुपये के बराबर हो गया है, जिसका अर्थव्यवस्था, शेयर मार्केट पर विपरीत असर हो रहा है।

सेंसेक्स 82,000 व निफ्टी 25,000 से भी नीचे जा सकता है। 1965 के खाद्य संकट के समय भी 4.50 रुपये का 1 डॉलर था। 1985 में 13 रुपये 60 पैसे का डॉलर था। मनमोहन सिंह सरकार के समय 2010 में डॉलर की विनिमय दर 45 रुपये थी। 2015 में 63 रुपये का डॉलर था। 2022 में 1 डॉलर 74.5 रुपये, 2024 में 83 रुपये और अब 91.65 रुपये का हो गया है। अधिकांश व्यापार व अंतरराष्ट्रीय निवेश डॉलर में होता है।

कमजोर रुपये से निवेशकों का व्यवहार भी प्रभावित हुआ है। भारत खनिज तेल इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, यंत्र सामग्री, धातु व रसायन का आयात करता है। आयात दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है। इसलिए विमान सेवा के अलावा ऊर्जा व वाहन क्षेत्र की कंपनियों का खर्च बढ़ा है। विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से रकम निकाल रहे हैं। रकम निकाल रहे हैं।

रकम निकाल रहे हैं। 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये वापस निकाल लिए तथा 2026 के पहले पखवाड़े में 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बेचकर डॉलर के रूप में रकम ले गए। आयात पर निर्भर क्षेत्रों पर काफी दबाव है। केमिकल, खाद तथा मेडिकल उपकरणों के क्षेत्र की लागत बढ़ गई है।

आयात महंगा होने से एमएसएमई के लिए नकदी का संकट आ गया। इन कंपनियों ने प्रॉडक्ट का साइज घटा दिया या सेवा स्तर में कटौती कर दी। आयात पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बढ़ रही है। रुपये के गिरते मूल्य का घरेलू बजट, संपत्ति और व्यवहार पर असर पड़ा है। पूंजी का प्रवाह रुकने लगा है। रुपया कमजोर होने से टीवी, एयर कंडीशनर व वॉशिंग मशीन के दाम बढ़ गए क्योंकि इनमें इम्पोर्टेड उपकरण होते हैं।

इनकी कीमतें 8 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। सरकार की नीति रुपये का अवमूल्यन करने की नहीं है बल्कि वह उसे स्वाभाविक रूप से अपनी जगह बनाने दे रही है। अमेरिकाके टैरिफ बढ़ाने से भी भारत का निर्यात प्रभावित हुआ है। स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि भोजन की थाली पर भी इसका असर पड़ेगा और खाद्य वस्तुएं महंगी होती चली जाएंगी।

इन आशंकाओं के बावजूद आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दावा किया है कि आगामी कुछ वर्षों में भारत विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसका आधार डिजिटल व सामाजिक आधारभूत ढांचे में निवेश, समावेशी विकास, मैन्युफैक्चरिंग व नवोन्मेष होगा।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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