फिल्मों, इंस्टाग्राम और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अश्लीलता बढ़ती जा रही है।
लोकतंत्र में भ्रष्टाचार, वोट चोरी और स्वार्थ की नग्नता सबसे बड़ा कड़वा सच है।
खजुराहो की मूर्तियों से लेकर अफ्रीका की जनजातियों और इतिहास का हवाला
हर जगह नग्नता को देखने का नजरिया अलग बताया गया है।
Obscene Content : पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, कितनी बुरी बात है कि फिल्मों से लेकर राजनीति तक नंगापन बढ़ गया है। शुचिता और शालीनता तो रह ही नहीं गई। कितनी ही पत्र-पत्रिकाओं में अभिनेत्रियों व मॉडेल्स की बड़ी अधनंगी तस्वीरें इस उम्मीद से छापी जाती हैं कि इससे उनकी बिक्री बढ़ेगी। पहले उच्चकोटि के सार्वजनिक प्रोग्राम हुआ करते थे लेकिन अब लोग नग्नता का अवलोकन करने के लिए इंस्टाग्राम देखते हैं। बताइए व्यक्ति की दशा और दिशा क्या है? समाज कहां जा रहा है?'
हमने कहा, 'आपने कहावत सुनी होगी- अपने हमाम में सभी नंगे हैं। हमाम का अर्थ है स्नानघर या गुसलखाना! उच्च आदर्शों वाले हमारे लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की नग्नता व्याप्त है। जज के घर से अधजले नोट के बंडल निकलते हैं। जनकल्याण के पीछे स्वार्थ का नंगापन हैं। दान-चंदे की चोरी का नग्न सत्य सामने आ चुका है। वोट चोरी के नंगे सच की भी चर्चा हो रही है। इसे देखते हुए आप नग्नता को स्वाभाविक और सरल रूप से लीजिए।'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, आप समस्या की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं। आजकल ओटीटी प्लेटफार्म पर अश्लीलता भरी नंगी फिल्में आ रही हैं जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देख पाना मुश्किल है। न जाने कहां चली गईं धार्मिक और पौराणिक फिल्में?'
हमने कहा, 'पहले भी धार्मिक फिल्मों में इंद्र के दरबार में अप्सराओं का डान्स दिखाया जाता था। साहित्य में प्रेमचंद जैसे समाजसुधार के बारे में लिखनेवाले लेखक थे तो सआदत हसन मंटो, पांडेय बेचन शर्मा उग्र और कुशवाहा कांत जैसे अश्लील लेखन वाले साहित्यकार भी थे।
कला के क्षेत्र में नग्न चित्रकला या न्यूड पेंटिंग का अलग ही स्थान है। खजुराहो की नग्न मूर्तियां देखने विदेशी पर्यटक आते हैं और देखकर दंग रह जाते हैं। पशु-पक्षी, नदी, पहाड़, वृक्ष सभी खुले और अनावृत्त हैं।
अफ्रीका के घने जंगल और अंदमान-निकोबार की जनजाति के लोग निर्वस्त्र रहते हैं। महात्मा गांधी की घुटनों तक पहनी छोटी धोती को देखकर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने उन्हें 'नंगा फकीर' कहा था। आपको सृष्टि को देखने के लिए अपनी दृष्टि बदलनी होगी।'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा