अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (सोर्स: सोशल मीडिया) 
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नवभारत विशेष: कितना टिकेगा अमेरिका व ईरान के बीच समझौता, अकारण युद्ध ने ट्रंप की पोल खोली

Iran Israel Ceasefire: मध्य पूर्व में तनाव कम होने के संकेत मिले हैं, लेकिन क्षेत्रीय विवाद अब भी बरकरार हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े खतरे और भारतीय जहाजों की सुरक्षा चिंता का विषय बने हुए हैं।

अंकिता पटेल

Middle East Shipping Crisis: युद्ध फिर शुरू नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है इसलिए कि इजराइल ने कहा है कि उसकी सेना लेबनान, सीरिया व गाजा के कब्जे किए हुए क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाए रखेगी और यही मध्य पूर्व में विवाद व जंग की असल जड़ है। बहरहाल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की इस घोषणा को कि वॉशिंगटन व तेहरान ने 'महान समझौता' पूर्ण कर लिया है। फिलहाल वैश्विक राहत अवश्य मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझौते का स्वागत करते हुए पुनः शांति बहाली की उम्मीद व्यक्त की है।

इस बीच 15 जून को भारत आने वाले एलएनजी कैरियर दिशा ने सुरक्षित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार किया, जिससे यह आशा मजबूत हुई है कि जो अन्य 34 भारतीय व विदेशी झंडों वाले जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं, वह भी जल्द व सुरक्षित भारतीय बंदरगाहों पर आ जाएंगे। लेकिन चिंता का विषय यह है कि समझौते की घोषणा के बाद भी भारतीय क्रू वाली चौथी शिप (एमटी बोकएम जिस पर हांगकांग का झंडा था) को टारगेट किया गया, हालांकि किसी नाविक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

समझौते की घोषणा के बाद बेंट ऑयल के दाम गिरकर 83 डॉलर प्रति बैरल हो गए, जो कि पिछले 3 माह के दौरान सबसे कम हैं, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इस युद्ध से अमेरिका को हासिल क्या हुआ? दोनों पक्षों ने अभी सिर्फ डिजिटल हस्ताक्षर किए हैं। कहने का अर्थ यह है कि अमेरिका व ईरान ने युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौते के फ्रेमवर्क पर अभी तक सहमति व्यक्त की है, लेकिन मेमोरेंडम की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

अमेरिका का कहना है कि वह होर्मुज में 'टोल-फ्री' समुद्री ट्रैफिक के लिए प्रयास करेगा, जबकि ईरान का कहना है कि वह 'समुद्री सेवा फीस' चार्ज करेगा, जिसे टोल नहीं कहना चाहिए। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तकनीकी वार्ता के लिए 60 दिन की खिड़की खोली गई है। तेहरान इस बात पर सहमत हो गया है कि वह न तो परमाणु हथियारों का उत्पादन करेगा और न ही उन्हें हासिल करेगा।

पूर्ण समझौता होने तक ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को फ्रीज कर देगा। अमेरिका ईरान के फ्रोजेन एसेट्स (25 बिलियन डॉलर) को रिलीज करेगा और ईरान पर कोई नई पाबंदी नहीं लगाएगा (यूरोपीय देशों ने भी ईरान से अपनी पाबंदी हटाने की घोषणा की है)। एक निश्चित अवधि के लिए अमेरिका ईरान पर से तेल पाबंदी को हटाएगा।

युद्ध के बाद भी सवाल बरकरार, अमेरिका को क्या हासिल हुआ?

वॉशिंगटन ईरान के लिए एक पुनर्निर्माण योजना तैयार करेगा, जिस पर 60 दिन के भीतर समझौता होगा। समझौते की जितनी बातें सार्वजनिक की गई हैं, उनमें सिर्फ तीन बातें ही महत्वपूर्ण हैं। एक, होर्मुज को खोला जाएगा। दो, ईरान न परमाणु हथियारों का उत्पादन करेगा और न उन्हें किसी अन्य देश से हासिल करेगा। तीन, ईरान पर कोई नई पाबंदी नहीं लगाई जाएगी, पुरानी पाबंदियां हटाई जाएंगी और उसके 25 बिलियन डॉलर के फ्रोजेन एसेट्स रिलीज किए जाएंगे।

इसलिए सवाल है कि इस बेमतलब के युद्ध से हासिल क्या हुआ? होर्मुज तो 28 फरवरी से पहले सबके लिए खुला ही हुआ था और वह भी बिना किसी निगरानी व फीस के। अब उसका संचालन ईरान व ओमान करेंगे और वह 'सर्विस फीस' भी लेंगे। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि इस युद्ध व समझौते से अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ बल्कि उसकी वैश्विक दादागीरी की पोल जरूर खुल गई।

अकारण युद्ध ने ट्रंप की पोल खोली

अमेरिका व ईरान के बीच शांति के एमओयू पर सहमति बनी है, वार्ता के लिए 60-दिन की खिड़की खोली है जिस पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने तय हुए हैं। इसे तब तक एक 'ठोस समझौते' के रूप में देखना बड़ी भूल होगी, जब तक कि यह डील लागू न हो जाए। इससे पहले अमेरिका व ईरान दो बार ऐसी ही सहमति बनाने के कगार पर पहुंच चुके थे, हस्ताक्षर भी होने को थे, लेकिन अमेरिका व इजराइल ने हमले कर दिए।

लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा

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