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नवभारत संपादकीय: महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू, अब सुप्रीम कोर्ट में होगी असली परीक्षा

Maharashtra Conversion Law: महाराष्ट्र में 30 जुलाई से धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हो गया है। इसकी संवैधानिक वैधता को लेकर SC में पहले से लंबित याचिकाओं के कारण अब इस कानून की न्यायिक परीक्षा भी होगी।

अंकिता पटेल

Maharashtra Freedom Religion Act: दबाव या प्रलोभन के जरिए किए जाने वाले धर्मांतरण के मामलों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से बनाया गया महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2006 गत 30 जुलाई से राज्य में लागू हो गया। यद्यपि महाराष्ट्र देश का 13 वां ऐसा राज्य है, जहां इस प्रकार का धर्मांतरण विरोधी कानून लागू किया गया, लेकिन इसका न्यायिक परीक्षण किया जाएगा।

इसकी वजह यह है कि नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेस इन इंडिया जैसे संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में देश के 12 राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों की वैधता को चुनौती दी है। नागरिक अधिकार संगठनों ने दलील दी है कि महाराष्ट्र सरकार को अपना कानून अधिसूचित करने से पहल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजा करना चाहिए था।

धर्मांतरण कानून में सख्त सजा और जमानत पर कड़े प्रावधान

महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून में कठोर दंड व जमानत नहीं देने का प्रावधान है। इसम अभियुक्त पर स्वयं को बेगुनाह सिद्ध करने का दायित्व डाला गया है। इस कानून के अनुसार धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले 60 दिनों का नोटिस जिला दंडाधिकारी को देना होगा।

उसे 25 दिनों के भीतर अपने धर्मपरिवर्तन को पंजीबद्ध करना होगा अन्यथा यह धर्मांतरण पूरी तरह अवैध व गैरकानूनी माना जाएगा। इस कानून में अवैध धर्मांतरण पर 7 वर्ष तक का कारावास तथा 5 लाख रुपये तक जुर्माने का कठोर प्रावधान है। इसमें निकट संबंधियों जैसे कि अभिभावकों या भाई-बहनों द्वारा पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का प्रावधान है। अभियुक्त को स्वयं के निर्दोष होने का सबूत देना होगा।

धर्मांतरण कानून को हाईकोर्ट में चुनौती की तैयारी

नागरिक अधिकार के पैरोकारों तथा सिटीजन्स फॉर पीस एंड जस्टिस (सीजेपी) तथा क्षेत्रीय राजनीतिक नेताओं ने घोषणा की है कि वह महाराष्ट्र के इस कानून को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती देंगे, इसके लिए उन्होंने 3 संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया है। एक है निजता और स्वायत्तता का अधिकार, दूसरा लुभाने शब्द की अस्पष्टता तथा तीसरा खुद को निर्दोष होने का सबूत देने की बाध्यता।

आलोचकों का कहना है कि धर्मांतरण के व्यक्तिगत निर्णय की जिला दंडाधिकारी को 60 दिन पहले सूचना देना, निजता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। लुभाने की कानूनी परिभाषा में बहुत सी बातें आती हैं जैसे कि धार्मिक संस्थाओं से मुफ्त शिक्षा देना, बेहतर जीवनशैली का वादा करना या दैवीय तरिकों से संकट दूर करना।

धर्मांतरण कानून पर दुरुपयोग और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस

कानूनी जानकारों की राय में पुलिस इसका दुरुपयोग कर सकती है। किसी व्यक्ति का गुनाह सिद्ध करने की बजाय उसे खुद को निर्दोष साबित करने को बाध्य करना आपराधिक न्यायशास्त्र के नियमों के खिलाफ है।

इसमें व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद पर रोक लगती है तथा यह कानून कुछ खास समुदायों को निशाना बनाता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि सत्तारूढ़ बीजेपी महंगाई व बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए यह कानून लाई है। बीजेपी व हिंदू संगठनों का आरोप रहा है कि विदेशी धन से ईसाई मिशनरी गरीबों व आदिवासियों का बड़ी तादाद में धर्मांतरण कराते हैं।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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