Karnataka Congress Leadership Crisis: कर्नाटक में 1980 के दशक से किसी भी पार्टी ने लगातार दूसरी बार सरकार नहीं बनायी है। सिद्धारमैया को बदलने से क्या कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी चली जाएगी और पार्टी 2028 के विधानसभा चुनाव का सामना ताजा छवि से कर पायेगी? ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने अतीत में जो गलतियां की, उन सबसे बचने का प्रयास कर रही है। राजीव गांधी ने 1990 में एयरपोर्ट पर वरिंद्र पाटिल को बतौर मुख्यमंत्री बर्खास्त कर दिया था, जिसके लिए राज्य की सबसे बड़ी जाति लिंगायत ने अभी तक कांग्रेस को माफ नहीं किया है। राहुल गांधी ने सिद्धारमैया के इस्तीफे की मांग खामोश शालीनता व राज्यसभा सदस्यता के साथ की।
सिद्धारमैया ने भी बदलाव को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने राज्यसभा सीट के ऑफर को भी ठुकरा दिया। हाई कमान से मुलाकात करने के बाद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जाति सर्वे रिपोर्ट सौंप दी जाये। चूंकि रिपोर्ट में कर्नाटक में नये आरक्षण फॉर्मूले की मांग की गई है, इसलिए वह अगले मुख्यमंत्री के लिए किसी टाइम बम से कम नहीं है।
इससे सिद्धारमैया को मंच भी मिल जाता है कि वह अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों व दलितों की राजनीति में लौट आएं, वह कर्नाटक में कांग्रेस के एकमात्र वरिष्ठ नेता हैं, जिनका जनाधार है। विपक्ष उनकी इस चाल की अनदेखा नहीं करेगा। पिछड़े गुटों की राजनीति में सिद्धारमैया के लौटने से वही आर्थिक प्रक्रियाएं उबाल लेने लगेगी, जिनकी वजह से राज्य में पार्टियों का पुनः चयन नहीं हो पाता है। 1980 तक कर्नाटक वह राज्य था, जहां सत्तारूढ़ पार्टी कभी हारती नाहीं थी।
फिर यह होने लगा कि सत्तारूढ़ पार्टी कभी लगातार न जीत पाती। यह सब कर्नाटक में भूमंडलीकरण की वजह से हुआ। संचार क्रांति ने बंग्लुरु के टेक्निकल मैनपॉवर को वैश्विक अवसरों तक पहुंचाया। इसके अतिरिक्त उदारीकरण के लाभों से बंग्लुरु को वैश्धिक पहचान मिली, आईटी सेवाओं के केंद्र के रूप में। कर्नाटक देश में सबसे तेजी से विकास करने वाला राज्य बन गया। सफलता की केवल एक जिले तक केंद्रित रही।
कर्नाटक की आय में बंग्लुरु का शेयर निरंतर बढ़ता रहा और अब राज्य के जीएसडीपी में लगभग 40 प्रतिशत का हिस्सा है, बाकी जिले इस प्रकार का विकास नहीं कर पाये हैं और इस आर्थिक असमानता ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि राजनीतिज्ञ इसे अनदेखा नहीं कर पायेंगे। बतौर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पहले टर्म में मुफ्त चावल योजना आरंभकी। दूसरे टर्म में इसका विस्तार पांच गारंटियों में कर दिया गया। राज्य द्वारा संसाधनों का ट्रांसफर गरीबों की ओर करना राजनीतिक दृष्टि से आकर्षक हो सकता है, लेकिन उससे असमानता के बोध को कम नहीं किया जा सकता जोकि बंगलुरु व अन्य जिलों के बीच है। आईटी प्रोफेशनल्स को नौकरी से निकाले जाने की वजह से राज्य का विकास इंजन धीमा हो गया है। इससे सरकार का राजस्व प्रभावित होता है और राज्य में कल्याणकारी कार्य करना कठिन हो जाता है। बड़ी भारतीय कम्पनियां अब विदेशों में निवेश कर रही हैं। विदेशों में भारतीय एफडीआई जो 2020-21 में लगभग 11 बिलियन डॉलर था वह 2024-25 में बढ़कर 28 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया। राजनीतिक चुनौती के साथ आर्थिक योजना को भी विकसित करना होगा।
कांग्रेस ने कर्नाटक में मुख्यतः दो कारणों से अपना मुख्यमंत्री बदलने का फैसला किया है। एक, सत्ता विरोधी लहर को कम करने के लिए, दूसरा शिवकुमार से किये गए वायदे को पूरा करने के लिए, लेकिन सिद्धारमैया के वक्तव्य को अगर पढ़ा जाये तो शिवकुमार के लिए राहें आसान नहीं होने जा रही है, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्यसभा में जाने से इंकार कर दिया है।
अब भी ऐसे दर्जनों विधायक हैं जो सिद्धारमैया से वफादारी का दम भरते हैं। फिलहाल सिद्धारमैया खुद को कांग्रेस के लिए समर्पित बता रहे हैं। इस्तीफा देने से पहले मंत्रिमंडल की बैठक में शिवकुमार ने उनके बरण स्पर्श किये व उन्होंने शिवकुमार को अपने गले लगाया, लेकिन राजनीति में जो दिखता है वह अक्सर होता नहीं है।
लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा