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नवभारत संपादकीय: UN में जयशंकर का पाकिस्तान पर वार, बोले- आतंकवाद के खिलाफ भारत का रुख नहीं बदलेगा

S Jaishankar Pakistan UN: संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन में एस. जयशंकर ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को लेकर भारत का रुख स्पष्ट किया। वहीं पेटल गहलोत ने पाकिस्तान के सेना की भूमिका पर सवाल उठाए।

अंकिता पटेल

Jaishankar UNGA Pakistan Terrorism: कुछ बातें साफ-साफ और डंके की चोट पर कह देना हमेशा बेहतर होता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें अधिवेशन में विदेशमंत्री एस। जयशंकर ने पाकिस्तान की खिंचाई करते हुए कहा कि आतंकवाद को श्रृंखलाबद्ध तरीके से चलाने वाले इस देश की खोखली व बेबुनियाद दलीलें टिक नहीं पाएंगी। हम आतंकवाद से अपनी रक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते रहेंगे। महासभा के सामने आतंकवाद के सीरियल प्रैक्टिशनर ने तथ्यों की तोड़मरोड़ की है।

आतंक के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति से भारत जरा भी पीछे नहीं हटेगा। आतंकवाद शांति के लिए निरंतर खतरा बना हुआ है। यूएन में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने पाकिस्तान के शासन को 'सेना का, सेना द्वारा और सेना के लिए' करार दिया। उन्होंने कहा पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार ने गत वर्ष नवंबर में 27 वां संविधान संशोधन पारित कर अपने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असिम मुनीर को आजीवन किसी भी प्रकार के कानूनी मुकदमे या अभियोजन से छूट प्रदान कर दी।

UN सुधार पर जयशंकर का जोर

जिस देश ने अपने ही नागरिकों के खिलाफ अपनी राजधानी की किलाबंदी कर रखी है, वह लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों की बात किस मुंह से कर रहा है? पाकिस्तान एक कठपुतली सरकार है, जिसकी नीति झूठ और छल-प्रपंच पर टिकी है। जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर नियंत्रित करने वाले देशों की आलोचना करते हुए कहा कि यह अपने मतलब के लिए इस विश्वसंस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं।

यूएन में सुधार लाए जाने की आवश्यकता है, जो एक निरुपयोगी संगठन बनता जा रहा है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान यूएन में अपना अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं। इसका वर्तमान ढांचा आधुनिक भू-राजनीतिक सच्चाइयों से दूर है और 8 दशक पुराने ढरें पर चल रहा है।

8 दशक पुरानी व्यवस्था पर सवाल

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी सदस्यों के विस्तार की मांग करता आ रहा है, लेकिन उसकी अनसुनी की गई। यूएन के इरादों को लेकर विश्व में अवसाद बढ़ता जा रहा है। वास्तविक चिंताओं को ध्यान में रखते हुए यूएन में सुधार किए जाने चाहिए। इसके लिए सभी की राय लेनी होगी।

संबंधित पक्षों से चर्चा के बिना उठाया गया कदम पाखंड होगा। अनेक वर्षों के दौरान यह धारणा बनती जा रही है कि विश्व शांति स्थापित करने तथा संघर्ष रोकने की दिशा में यूएन पूरी तरह अक्षम साबित हुआ है। यूएन की हालत यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने उसके मुख्यालय में भी उसका उपहास किया है। न जाने क्यों यूएन सुधार लागू करने से कतरा रहा है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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