ISRO Privatisation Private Companies: इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के संभावित निजीकरण के संबंध में भूमिका स्पष्ट किए जाने की मांग इस संस्था के सभी कर्मचारी संगठनों ने की है, लेकिन इसरो के प्रबंधन ने निजीकरण की किसी भी योजना से इनकार किया है। इतने पर भी कर्मचारियों की शंका निराधार नहीं है। सरकार इसरो के कई काम निजी क्षेत्र को सौंप रही है। रक्षा विभाग ने 31 उपग्रहों के ठेके निजी कंपनियों को दिए जबकि इसरो को 21 उपग्रहों के ऑर्डर मिले।
हाल ही में इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (इन स्पेस) के प्रमुख पवन गोयनका ने बयान दिया कि समय के साथ उपग्रह प्रक्षेपण का काम इसरो के पास न रहकर निजी क्षेत्र को दिया जाएगा। उनके इस बयान के बाद इसरो के 9 कर्मचारी संगठनों ने सरकार से सीधे पूछताछ की कि वह क्या करना चाहती है? गत माह स्काईरूट कंपनी ने भारत के प्रथम निजी प्रक्षेपक विक्रम-1 को अंतरिक्ष भेजा गया, तब इसरो के 100 से अधिक वैज्ञानिकों के इस्तीफे की खबर आई।
6 वर्ष पहले सरकार ने अंतरिक्ष अनुसंधान का क्षेत्र निजी निवेश के लिए खुला किया। इसके बाद कुछ ही वर्षों में स्काईरूट, अग्निकुल कॉसमस, दिगंतारा, ध्रुव स्पेस, पिक्सेल, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस नामक निजी कंपनियां बन गईं। अब इस क्षेत्र में 400 छोटे-बड़े स्टार्टअप हैं। इनमें से कोई भी अंतरिक्ष के बारे में मूलभूत या दीर्घकालीन अनुसंधान नहीं करता।
इन नए उद्यमियों में चंद्रयान या मंगलयान जैसे जटिल अंतरिक्ष अभियान चलाने या लंबी दूरी पर उपग्रह स्थापित करने की बौद्धिक व आर्थिक क्षमता नहीं है। यह कंपनियां सिर्फ रॉकेट प्रक्षेपित करने व मौसम अनुमान या संचार का काम करने वाले छोटे उपग्रह भेजने का काम करती हैं। हालत यह है कि अत्यल्प संसाधनों से अनुसंधान इसरो करता है लेकिन उसका आर्थिक फल निजी क्षेत्र चखता है।
अंतरिक्ष ही नहीं परमाणु ऊर्जा निर्माण पर भी बड़े उद्योगपतियों की नजर है। यह तथ्य सर्वविदित है कि नासा की तुलना में इसरो का बजट नहीं के बराबर है फिर भी इसरो के प्रतिभाशाली व कर्मठ वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है।
नासा का बजट 2.25 लाख करोड़ का है जबकि इसरो पर सरकार सालाना 15-16 हजार करोड़ रुपये खर्च करती है। क्या इस संस्था की उपेक्षा कर निजी कंपनियों को बढ़ावा देना उचित है? अमेरिका में नासा से प्रतिस्पर्धा करने वाला स्पेस-एक्स कंपनी का मालिक एलन मस्क है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। इसरो को छोड़कर किसी में 10,000 किलो का उपग्रह प्रक्षेपित करने की क्षमता नहीं है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा