अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध (डिजाइन फोटो) 
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नवभारत विशेष: लोग कभी खुश नहीं हो सकते; आधुनिकता की श्वेत क्रांति से बारूद के ढेर तक, जानिए ईरान का पूरा सफर

Iran Israel War: आधुनिकीकरण के दौर से लेकर इस्लामिक गणराज्य बनने और अब अमेरिका-इजराइल के भीषण हमलों तक, ईरान के इतिहास। जानिए कैसे 'पश्चिम एशिया का पेरिस' युद्ध के मैदान में बदला।

आकाश मसने

History of Iran: 1970 के दशक में जब ईरान विकास की राह पर था, तब भी इससे कुछ लोग खुश नहीं थे। अमेरिका व इजराइल ने जो कुछ किया, उससे भी कुछ लोग खुश नहीं हैं। बावजूद इसके कि ईरान के करीब 80 फीसदी लोग वहां की सरकार को हटाने के पक्ष में ही हैं। 28 फरवरी को पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू हो गया। अमेरिकियों ने (ऑपरेशन एपी फ्यूरी) चलाया, जिसमें इजराइल (लॉयन्स रोअर) भी शामिल हो गया। कुछ ही घंटों में ईरान पर भीषण बमबारी हुई और एक दिन के अंदर उन्होंने ईरान के रक्षा मंत्री, शीर्ष जनरलों और सर्वोच्च नेता खामनेई को मार गिराया।

ईरान में श्वेत क्रांति

वर्ष 1979 से पहले ईरान 'पश्चिम एशिया का पेरिस' था। ईरान के शाह ने ईरान को आधुनिक बनाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने 1963 में ईरान को पाश्चात्य रंग-ढंग में ढालने के लिए श्वेत क्रांति शुरू की। तेल से अर्जित अकूत दौलत ने बांध, हाईवे बनाने में मदद की और युवा स्नातकों को पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए ग्रामीण इलाकों में भेजा। ईरान ने अपनी कारें 'पेकान', स्टील और उपभोक्ता सामग्री बनानी शुरू कर दी। 1970 के दशक तक वहां की अर्थव्यवस्था हर साल 9-10 फीसदी की दर से बढ़ रही थी। ऊपर से लेकर नीचे तक आधुनिकीकरण ने देश को एक क्षेत्रीय शक्ति केंद्र बना दिया। लेकिन इतना सब विकास होने के बावजूद वहां के कुछ लोग हमेशा दुखी रहते थे, चाहे जो भी हो जाए।

कुछ लोगों को लगा कि आधुनिकता के कारण ईरान इस्लामी परंपरावादी संस्कृति से दूर जा रहा है और वे सरकार बदलना चाहते थे। खासकर व्यापारी वर्ग और मौलवियों को लगा कि शाह का पाश्चात्यीकरण का अभियान ईरानी-इस्लामी पहचान को खत्म कर रहा है। लोगों को उनके अपने ही लोगों द्वारा बेवकूफ बनाना मुश्किल नहीं है। देश अपनी सनक में उसी के खिलाफ चला गया, जिसने उन्हें आधुनिक बनाया था।

16 जनवरी, 1979 को शाह, मोहम्मद रजा पहलवी इलाज के लिए अवकाश पर ईरान छोड़कर मिस्त्र चले गए। 14 साल से निर्वासित अयातुल्ला खामेनेई देश की बागडोर संभालने के लिए लौटने वाले थे। हालांकि कुछ समझदार लोग ऐसा नहीं चाहते थे। 16 जनवरी से 31 जनवरी, 1979 तक का पखवाड़ा बहुत ज्यादा तनाव में बीता। प्रधानमंत्री बख्तियार ने हवाई अड्डे बंद करके खामेनेई की वापसी को रोकने की कोशिश की। एक फरवरी, 1979 को बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को हवाई मार्ग फिर से खोलना पड़ा, तब अयातुल्ला खामेनेई तेहरान हवाई अड्डे पर उतरे। विदेशी अपनी जान बचाने के लिए ईरान से भाग गए।

ईरान को ईरानियों ने ही अंधकार में धकेला

धर्मनिरपेक्ष 'बुद्धिजीवी', छात्र, अयातुल्ला खामेनेई के धार्मिक अनुयायी शाह को हटाने के एक ही लक्ष्य के साथ एकजुट हुए। और ईरान को खुद ईरानियों ने ही अंधकार के युग में धकेल दिया ! नए शासन ने देश को पूरी तरह बदल दिया और हालात बिगड़ने लगे। 30-31 मार्च, 1979 को एक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ईरानियों से पूछा गया कि वे इस्लामी गणराज्य चाहते हैं या नहीं। उत्तर केवल 'हां' या 'न' में देना था। एक अप्रैल, 1979 को खामेनेई ने जनमत संग्रह की जीत का ऐलान किया (जिसे कथित तौर पर 98 फीसदी समर्थन मिला) और आधिकारिक तौर पर ईरान के इस्लामी गणराज्य के उदय की घोषणा की गई। उन्होंने फिर से इसकी मांग की।

देश को सैन्य ताकत की तरफ धकेला गया, जिसमें मिसाइलों और रिवोल्यूशनरी गार्ड पर ध्यान केंद्रित किया गया, ठीक हिटलर के एसएस (रक्षा बल) की तरह, जो सरकार के प्रति वफादार थे। ईरान परमाणु हथियार बनाना चाहता था, लेकिन हमेशा कहता रहा यह शांतिपूर्ण मकसद के लिए है। ईरान ने 60 फीसदी यूरेनियम (400 किलोग्राम से अधिक) का संवर्धन किया है, जो एक खतरनाक सीमा है।

नए शासन ने देश को पूरी तरह बदल दिया

धर्मनिरपेक्ष 'बुद्धिजीवी', छात्र, अयातुल्ला खामेनेई के धार्मिक अनुयायी शाह को हटाने के एक ही लक्ष्य के साथ एकजुट हुए। और ईरान को खुद ईरानियों ने ही अंधकार के युग में धकेल दिया ! नए शासन ने देश को पूरी तरह बदल दिया और हालात बिगड़ने लगे। 30-31 मार्च, 1979 को एक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ईरानियों से पूछा गया कि वे इस्लामी गणराज्य चाहते हैं या नहीं।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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