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नवभारत विशेष: घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत, फिर भी वैश्विक चुनौतियों के आगे क्यों कमजोर पड़ रहा भारत?

India Economic Growth: रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह और बेहतर विकास दर के बावजूद व्यापार घाटा, रुपये में गिरावट और विदेशी निवेश में कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।

अंकिता पटेल

Highlights

  • व्यापार घाटा, रुपये में गिरावट और विदेशी निवेश में कमी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबाव बढ़ा है।

  • अक्टूबर में जीएसटी संग्रह 2.31 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।

  • 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 7.35% रही।

  • औद्योगिक विकास दर भी बढ़कर 7.3% हुई, जो घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती दर्शाती है।

Indian Economy Growth and Global Challenges: एक समय था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी अनुकूल घरेलू आर्थिक परिस्थितियों से बाह्य आर्थिक परिस्थितियों की हर प्रतिकूलता को झेल लिया करती थी और उससे निष्प्रभावी रहा करती थी। परंतु आज देश की आर्थिक परिस्थितियां अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के आगे अपने को बेबस महसूस करती दिखती हैं। हमारा बढ़ता व्यापार घाटा, विदेशी मुद्रा कोष का कमोबेश स्थिर आकार, रुपये के मूल्य में निरंतर गिरावट, विदेशी प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश में हो रहा निरंतर संकुचन और पूंजी बाजार में छाई मंदी बदस्तूर जारी है। जबकि देश की घरेलू स्थिति की बात करें तो वह अपने सर्वाधिक बेहतर दौर में चल रही है।

पिछले एक साल से जीएसटी स्लैब और स्लैब दरों में भारी कटौती के बावजूद देश में जीएसटी का रिकार्ड संग्रहण हुआ। अक्टूबर में दर्ज 2.31 लाख करोड़ रुपये की वसूली ने तो अब तक का रिकार्ड तोड़ दिया है। यह इस बात का परिचायक है देश के आतंरिक कारोबार और उपभोग की मांग ठीक स्थिति में है।

2026-27 की दूसरी तिमाही में देश ने 7.35 प्रतिशत की विकास दर हासिल की, जबकि अमेरिका में हासिल विकास दर इस दौरान 2.2 प्रतिशत, जी-20 के देशों में 3 प्रतिशत और चीन में महज 4.3 प्रतिशत की सालाना विकास दर हासिल हो पाई है। यदि भारत के औद्योगिक विकास की बात करें तो मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में यह दर 7.3 प्रतिशत थी, जो गत वर्ष की इस अवधि में 6.2 प्रतिशत थी।

घरेलू बिक्री मजबूत, फिर भी बाहरी अर्थव्यवस्था पर दबाव क्यों?

देश की दो बड़ी कार कंपनियों मारुती और टाटा ने अब तक की सर्वाधिक बिक्री पिछले अक्टूबर महीने में दर्ज की। ऐसे में सवाल है कि हमारा घरेलू प्रदर्शन हमारी बाह्य अर्थव्यवस्था से तारत्म्य क्यों नहीं स्थापित कर पा रहा है? हम चीन की तरह निर्यातोन्मुखी विकास मॉडल की तरफ कूच करने की स्थिति में क्यों नहीं आ पा रहे हैं या फिर हम आत्मनिर्भरता के नारे के जरिये तमाम आयातित वस्तुओं का विकल्प क्यों नहीं स्थापित कर पा रहे हैं? भारत की अर्थव्यवस्था को उलझाने में पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध और अशांति की बड़ी भूमिका रही है।

इस वजह से भारत में पेट्रोलियम कच्चे तेल, गैस, उर्वरक, स्वर्ण धातु इत्यादि के सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया, तो दूसरी तरफ हमारे निर्यात और विदेश से भेजी जाने वाली कमाई को भी प्रभावित किया। रही सही कसर अमेरिका की टैरिफ धमकियों और भारत विरोधी फैसलों ने पूरी की। 2008 में आये विश्वव्यापी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट का दौर हो अथवा 2022-24 में यूरोप अमेरिका में आई भारी महंगाई के दौर को भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने आसानी से झेल लिया था।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव, गिरते रुपये और निवेश की चिंता

भारत की अर्थव्यवस्था 2021 से लगातार दुनिया की सर्वाधिक वृद्धि दर के साथ वृहत आर्थिक प्रबंधन के हर मानकों पर खरी उतरती रही है। इसके बावजूद 2025 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था अपने को लाचार क्यों महसूस कर रही है? देश में चाहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हो या पोर्टफोलियो निवेश हो, उसमे वापसी का दौर चल रहा है।

भारत के मध्यवर्ग और घरेलू निवेशकों के लिए चिंता की सबसे बड़ी बात ये रही है कि पिछले दस साल से निरंतर उंचाईयों को छू रहा शेयर बाजार पिछले दो वर्षों से संभलने का नाम नहीं ले रहा। यह बात अलग है कि दिवाली में सेंसेक्स में उछाल आया।

2025 में एफपीआई यानी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1।66 लाख करोड़ रुपये की रकम वापस खींच ली और 2026 में अक्टूबर महीने तक ये 3।08 लाख करोड़ रुपये की रकम वापस खींच चुके हैं। इसका कारण यह बताया जाता है कि रुपये की डॉलर के मुकाबले गिरती कीमत और अमेरिका का भारत पर टैरिफ में किया जा रहा उतार चढ़ाव प्रमुख कारण है।

हमें अपनी बाह्य अर्थव्यवस्था की मजबूती से हासिल करना होगा। अभी हमारा निर्यात सितंबर महीने में 22 प्रतिशत बढ़कर 44 अरब डॉलर हो गया, पर हमारा आयात केवल 8 प्रतिशत बढ़कर भी कुल रकम के मामले में निर्यात से 30 अरब डॉलर ज्यादा यानी कुल 74 अरब डॉलर रहा। विदेशी मुद्राकोष की बात करें तो पिछले कई वर्षों से यह 700 अरब डॉलर के ऊपर नीचे होता रहता है।

ईरान युद्ध व टैरिफ का बुरा असर

पेट्रोलियम कंपनियों को आरबीआई ने सीधे विदेशों से डॉलर उगाही करने की अनुमति प्रदान की है। इस वजह से 96 रुपये रुपये की प्रति डॉलर की कीमत अब 94 रुपये के आस पास आ गई है। भारत में रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोर होने की वजह कच्चे तेल का भारी मात्रा में आयात बिल है। अच्छी बात ये है कि अप्रैल-सितंबर के दौरान भारत ने यदि १० अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया तो करीब 28 अरब डॉलर का तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी किया है।

लेख- मनोहर मनोज के द्वारा

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