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नवभारत विशेष: UNSC में स्थायी सीट की मांग तेज, भारत ने उठाए संयुक्त राष्ट्र में सुधार के सवाल

UN Security Council: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता व समान अधिकारों की मांग के साथ भारत व्यवस्था में सुधार चाहता है। G-4 देशों के साथ भारत प्रभावी संयुक्त राष्ट्र की पैरवी कर रहा है।

अंकिता पटेल

Highlights

  • भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट और समान अधिकारों की मांग दोहराई।

  • विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूएन को खारिज करने के बजाय सुधारने पर जोर दिया।

  • भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील के जी-4 समूह ने सुधार में देरी पर सवाल उठाए।

  • वैश्विक संघर्षों के बीच सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक, जवाबदेह और प्रभावी बनाने की जरूरत बताई।

India Permanent Seat in UN: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट और स्थायी सदस्यों के समान अधिकारों का प्रबल दावेदार है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के सुधारों के प्रति वह अत्यंत मुखर है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आज अपनी प्रासंगिकता के चौराहे पर खड़ी है। ईरान, इजराइल, रूस-यूक्रेन के लंबे खिंचते संघर्षों से लेकर म्यांमार और सूडान के गृहयुद्धों तक, वैश्विक कूटनीति के हर मोर्चे पर संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं और विफलताएं खुलकर सामने आ चुकी हैं। आवश्यकता इसे अधिक प्रतिनिधिक, जवाबदेह और प्रभावी बनाने की है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का विचार है कि यूएन को खारिज करने के बजाय इसे दुरुस्त करने की जरूरत है। भारत को सुरक्षा परिषद सुधार में हो रही देरी पर गहरा एतराज है और उसका यह कहना भी कि उसके साथ जापान, जर्मनी तथा ब्राजील यानी जी-4 समूह मानता है कि सुधार की प्रक्रिया को कुछ देशों के संकीर्ण हितों का बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुधार के साथ भारत की चाहत न सिर्फ अपने लिए स्थायी सीट सुरक्षित करना है, बल्कि स्थायी सदस्यों जैसे अधिकार पाने की भी है।

UNSC सुधार की राह में वीटो बाधा

मौजूदा स्थायी सदस्यों की स्थायी सीटों को बढ़ाने के प्रति अनिच्छा समझी जा सकती है। इटली, कनाडा के अलावा पाकिस्तान, - तुर्किए, नई स्थायी सीटों में बढ़त की बजाय अस्थायी सीटें बढ़ाने के पक्षधर हैं। तर्क है कि स्थायी सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय - निर्वाचित सदस्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि - नए स्थायी सदस्य बनने से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी और परिषद - में नए शक्ति-केंद्र बन जाएंगे। सुरक्षा परिषद की सबसे बड़ी - कमजोरी इसकी 5 सदस्यीय स्थायी संरचना और वीटो का विशेषाधिकार है। महाशक्तियों के परस्पर विरोधी हितों के कारण सीरिया, गाजा या यूक्रेन जैसे मानवीय संकटों पर भी प्रभावी - कार्रवाई संभव नहीं होती। वीटो देशों में आम सहमति असंभव है।

अमेरिका अपने रणनीतिक सहयोगियों के विरुद्ध प्रस्तावों को रोकने की ताकत छोड़ेगा नहीं। रूस और चीन भी अपने सामरिक हितों से जुड़े मामलों में इस विशेषाधिकार को महत्वपूर्ण मानते हैं। ब्रिटेन और फ्रांस वीटो पर संयम के पक्ष में पहल कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने भी इसे समाप्त करने के लिए कोई सर्वमान्य व्यवस्था स्थापित नहीं की है। जहां तक भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का प्रश्न है, तो भले ही पाकिस्तान या तुर्किये रोड़े अटकाएं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, उभरती आर्थिक महाशक्ति और शांति स्थापना के अंतरराष्ट्रीय अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ता के रूप में भारत का दावा अकाट्य है।

UNSC में भारत की स्थायी सीट की चुनौती

भारत को यह दिखाना होगा कि वह वैश्विक हितों को सर्वोपरि रखता है, हालांकि यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट तथा ईरान युद्ध के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में जिस तरह उसकी मत भिन्नता दिखी, रूस इजराइल और अमेरिका के हितों का समर्थन कूटनीतिक स्तर पर उसे किंचित कमजोर कर सकता है। निस्संदेह स्थायी सदस्यता का औचित्य तभी व्यापक रूप से स्वीकार्य होगा, जब भारत राष्ट्रीय हित और साझा वैश्विक जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित कर सके। चीन और अन्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी भारत की स्थायी सदस्यता का प्रबल विरोध कर रहे हैं। इसके बावजूद विशाल जनसंख्या, बढ़ती अर्थव्यवस्था, लोकतांत्रिक व्यवस्था, विकासशील देशों के हितों को सामने रखने की भूमिका भारत के स्थायी सदस्यता के दावे को मजबूत बनाती है।

यदि भारत को बिना वीटो के अधिकार वाली स्थायी सदस्यता मिली तो वह मौजूदा स्थायी सदस्यों से कम अधिकारों वाला सदस्य बन जाएगा। इससे सुरक्षा परिषद में भारत की उपस्थिति बढ़ेगी, लेकिन निर्णयों को रोकने या अपने विरुद्ध होने वाली कार्रवाई पर प्रभाव डालने की उसकी क्षमता समान नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन के लिए आवश्यक प्रक्रिया इतनी कठिन है कि व्यापक समर्थन के बावजूद अंतिम परिणाम सुनिश्चित नहीं है। दूसरी ओर, उसके वीटो अधिकार पर अनिश्चितकाल तक सहमति टलती रही तो भारत को कोई अतिरिक्त अधिकार ही नहीं मिलेगा।

प्रबल दावेदारी पर भी ध्यान नहीं

भारत की एक चुनौती यह भी है कि उसे केवल अपनी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए सीट मांगने वाले देश के रूप में न देखा जाए। उसे यह प्रमाणित करना होगा कि उसकी सदस्यता से छोटे और मध्यम देशों, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तथा वैश्विक दक्षिण के हितों को भी लाभ होगा। खाद्य सुरक्षा, जलवायु वित्त, ऋण संकट, तकनीकी असमानता और ऊर्जा उपलब्धता जैसे प्रश्नों पर भारत की भूमिका उसकी दावेदारी को अधिक विश्वसनीय बना सकती है।

लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा

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