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भारत-इजराइल राजनयिक संबंध, नरसिंहराव ने की थी पहल

नवभारत डेस्क

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) को लेकर भारत की नीति कभी एक सी नहीं रही। 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के उस प्रस्ताव का विरोध किया था जिसमें फिलस्तीन को यहूदियों और फिलस्तीनी अरबों के बीच बांटा गया था। यद्यपि हिटलर द्वारा बुरी तरह सताए गए यहूदियों के प्रति भारत ने सहानुभूति जताई थी किंतु इजराइल का निर्माण 6 लाख अरबों के लिए अन्यायपूर्ण बताया था। प्रथम प्रधानमंत्री पं। नेहरू ने फिलस्तीन की समस्या के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद को दोषी ठहराया था। 1948 में इजराइल बन जाने के बाद यद्यपि भारत ने उसे मान्यता दी लेकिन उसके साथ 42 वर्ष बाद 1992 में कूटनीतिक संबंध स्थापित किए।

यह साहसिक कदम पीवी नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री रहते हुए उठाया। उन्होंने अरब देशों की नाराजगी की परवाह नहीं की। इसके पहले शीत युद्ध की परिस्थितियों में भारत का झुकाव रूस की ओर था। अमेरिका की भूमिका इजराइल के कट्टर समर्थक की थी। पाकिस्तान फिलस्तीन का मजबूती से समर्थन कर रहा था। अरब  देशों में बड़ी तादाद में भारतीयों को रोजगार मिला हुआ था इसलिए भारत अरब राष्ट्रो व फिलस्तीन का समर्थन करता था। इंदिरा गांधी ने फिलस्तीन मुक्ति मोर्चा के प्रमुख यासर अराफात को भारत आमंत्रित किया था। यह उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति थी।

इससे कोई फायदा नहीं हुआ। अरब देशों ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत का समर्थन नहीं किया बल्कि पाकिस्तान का साथ देते रहे। जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब इजराइल से संबंधों में गति आनी शुरू हुई। कारगिल युद्ध के समय ऊंची पर्वत चोटियों पर बने बंकरों पर तैनात पाकिस्तानी फौजियों से निपटना चुनौती बन गया था। तब इजराइल ने भारत को बंकर तोड़नेवाला बम दिया। लेजर किरण से निशाना बाध कर सुखोई विमान से यह बम छोड़ा गया और बंकर उठा दिए गए। नरेंद्र मोदी के पीएम बनने पर तो इजराइल से भारत संबंध और घनिष्ठ हो उठे।

आतंक से निपटता है

इजराइल पूरी दृढ़ता से आतंकवाद से निपटता है। एन्टेबी कांड में उसके कमांडो ने अपने देश के बंधक बनाए लोगों को छुड़ा लिया था। अरब देशों से घिरा होने के बावजूद वह बेहद निडर है। आतंक का सफाया करने में वह पीछे नहीं हटता। अभी भी वह हमास, लेबनान और सीरिया से अकेले भिड़ रहा है। भारत की कूटनीति संतुलित है। वह चाहता है इजराइल और फिलस्तीन अच्छे पड़ोसी की तरह रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने 2018 में वेस्ट बैंक स्थित रामल्ला का दौरा किया था।

नरसंहार पर उतारू हमास

1987 में गठित हमास मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक शाखा है अक्टूबर 1997 में अमेरिका ने हमास को आतंकी संगठन करार दिया था। यूरोपीय यूनियन ने भी उसे विश्व के आतंकी गुटों की सूची में रखा था। हमास ने जिस तरह इजराइल के बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को अपनी क्रूरता का शिकार बनाया है, उसे देखते अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी उसे आतंकी मान रहा है। युद्ध की वहशियत में 300 से ज्यादा बच्चों की जान जा चुकी है। इनमें 40 बच्चे इजराइली और 260 से ज्यादा गाजा के हैं।

इजराइल ने इन बच्चों की तस्वीरें जारी की हैं जिन्हें उनके माता-पिता के सामने मारा गया। मानवता सिसक रही है लेकिन नर संहार जारी है। इजरवाइल और हमास का युद्ध अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया है। इजराइल ने सीरिया के 2 विमानतलों को राकेट हमलों का निशाना बनाया। इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हमास को पूरी तरह कुचल डालने की धमकी दी है। अब इजराइल गाजा पर जमीनी हमले की तैयारी में है।

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