परिसीमन बहस, (प्रतिकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: बढ़ती आबादी, बढ़ेंगी सीटें? परिसीमन के साथ सांसद-विधायकों की संख्या और पेंशन बोझ पर बहस तेज

Parliament Seats Increase: बढ़ती आबादी के बीच सांसद-विधायकों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन पर बहस तेज है। सीटें बढ़ने के साथ पेंशन बोझ और राजनीतिक ढांचे पर भी सवाल उठ रहे हैं।

अंकिता पटेल

MP MLA Pension Burden: देश की बढ़ती आबादी के अनुपात में कभी न कभी सांसदों-विधायकों की संख्या बढ़ानी ही होगी। इसके साथ ही उनकी पेंशन के बोझ का भी सरकार को विचार करना होगा। लोकसभा सदस्यों की तादाद वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 तक ले जाने का विचार है। इस समय परिसीमन विधेयक मंजूर नहीं हो पाया लेकिन इसे कब तक टाला जाएगा! निर्वाचन क्षेत्रों की पुनर्रचना के साथ संसद और विधानमंडलों में सीट बढ़ानी होंगी। राज्यसभा के 245 सदस्य मिलाकर कुल सांसदों की संख्या अभी 788 है। देश के 28 राज्य व केंद्रशासित प्रदेश मिलाकर कुल विधायकों की तादाद 4,123 है।

इसके अलावा महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे 6 राज्यों की विधानपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या 426 है। हर राज्य में पूर्व सांसदों और विधायकों को पेंशन दी जाती है।

लोकसभा और राज्यसभा के पूर्व सदस्यों को प्रतिमाह 31,000 रुपए मूल मासिक निवृति वेतन मिलता है। जिन सांसदों ने 5 वर्ष से ज्यादा प्रतिनिधित्व किया हो, उन्हें हर अतिरिक्त वर्ष के लिए प्रतिमाह 2,500 रुपए ज्यादा मिलते हैं।

जिस सांसद ने 10 वर्ष या 2 टर्म पूरे किए उसे 31,000 रुपए मूल निवृति वेतन के साथ 5 अतिरिक्त वर्षों के 12,500 रुपए मिलाकर कुल 43,500 रुपए मासिक पेंशन दी जाती है। इसके अलावा निशुल्क इलाज, अन्य भत्ते व सुविधाएं भी दी जाती हैं। सांसद के निधन के बाद उसके आश्रित को पेंशन की आधी रकम दी जाती है। कितने ही सांसद आर्थिक दृष्टि से काफी संपन्न करोड़पति या अरबपति रहते हैं लेकिन फिर भी वह पेंशन का हक नहीं छोड़ते।

केवल वरुण गांधी 13 वर्ष से लोकसभा सदस्य हैं लेकिन उन्होंने एक रुपया भी वेतन-भत्ता नहीं लिया, बल्कि अपनी ओर से कोरोना संकट के समय दवाइयों-आक्सीजन की व्यवस्था की चुनाव लड़ते समय जो नेता अपने पास करोड़ों की संपति व आय के साधन होने का हलफनामा भरते हैं, उनको इस पेंशन की कौन सी जरूरत है? प्रधानमंत्री मोदी चाहें तो ऐसे संपन्न सांसदों से स्वेच्छापूर्वक अपना निवृति वेतन त्यागने की अपील कर सकते हैं।

जहां तक राज्यों के विधानसभा सदस्यों के निवृति वेतन का मामला है वह हर राज्य में अलग है। हरियाणा में पूर्व विधायकों पर प्रतिवर्ष 28 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यदि सांसद-विधायक इस रकम का त्याग करें तो इससे सरकार का व्यय बचेगा जिसे वह राष्ट्रहित में जरूरतमंदों या गरीब जनता पर खर्च कर सकेगी। यदि जनप्रतिनिधियों में जनसेवा की भावना है तो वह स्वेच्छा से इस बारे में निर्णय ले सकते हैं।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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