वैश्विक उर्वरक संकट,(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया) 
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नवभारत विशेष: होर्मुज नाकेबंदी से गहरा रहा है खाद संकट, खाड़ी देशों से ही आता है उर्वरक

Global Fertilizer Shortage: वैश्विक उर्वरक संकट गहराया। होर्मुज मार्ग, गैस कमी और निर्यात कटौती से यूरिया-अमोनिया महंगे, कई देशों में खेती पैटर्न बदलने को मजबूर किसान।

अंकिता पटेल

Hormuz Fertilizer Supply Disruption: दुनिया के उर्वरक व्यापार का तकरीबन 30 फीसद होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। संसार का दूसरा सबसे बड़ा खाद निर्यातक देश चीन अपनी घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात में कटौती कर चुका है। नेचुरल गैस की कमी के चलते कई देशों में उर्वरक उत्पादकों को अपना उत्पादन कम करना पड़ रहा है।

युद्ध शुरू होने के बाद से यूरिया और अमोनिया की कीमतें वैश्विक स्तर पर क्रमशः 40 से 65 फीसद तक बढ़ गई हैं। उत्तरी गोलार्ध और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में त्राहिमाम मचा हुआ है। अफगानिस्तान ने युरिया के बैग की बढ़ती कीमत के चलते उसका इस्तेमाल ही छोड़ दिया। अमेरिका में तमाम किसान ज्यादा खाद की जरूरत वाले मक्का को छोड़कर कम उर्वरक की आवश्यकता वाले सोयाबीन उपजाने की सोच रहे हैं।

यूरोप की खेती में भी इसी तरह का बदलाव दिख रहा है। जाहिर है होर्मुज में फंसी 20 लाख टन खाद जल्द बाहर नहीं निकली, तो फसलों को सही वक्त पर पोषण नहीं मिल पाएगा। पैदावार गिर जाएगी, कीमतें बढ़ेंगी और शहरों में रहने वाले गरीब खाली पेट रह जाएंगे। हमारे देश के अधिकतर किसान मानसून के बाद अगली फसल की बुआई करेंगे, तो उर्वरक की मांग चरम पर होगी।

किल्लत और कालाबाजारी दोनों का खतरा है। इसलिए फॉस्फेट, यूरिया, अमोनिया की आपूर्ति बाधित होना तय है। हम सालाना लगभग 20 करोड़ टन उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके आदि शामिल हैं। हम यूरिया उत्त्पादन ठीकठाक मात्रा में करते हैं फिर भी अपनी जरूरत के उर्वरक का 40 फीसद बाहर से ही मंगाते हैं। फॉस्फेट और पोटाश के मामले में हमारी आयात निर्भरता 80 से 90 प्रतिशत तक है।

इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, कतर, ओमान द्वारा होर्मुज मार्ग से ही आता है। यहां तक कि 50 से 60 प्रतिशत आयातित उर्वरक या उसका कच्चा माल इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। देश में बनने वाले उर्वरकों के लिए जो कच्चा माल चाहिए, जैसे फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, एलएनजी वह भी आयातित ही होता है।

यूरिया बनाने के लिए बाहर से एलएनजी न मिले तो सब ठप। होर्मुज में व्यवधान से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और उसके घटकों के दाम डेढ़ गुना हो चुके हैं। राज्यों के चुनावों के नतीजे तक तेल के दाम को नहीं छेड़ा गया है। अगर डीजल के दाम बढ़े, तो यह खेती के लिए और भी दुष्प्रभावी होगा।

संकट लंबा खिंचा तो खरीफ सीजन के दौरान खाद की कीमतें सवाया हो सकती हैं या फिर सरकार को भारी सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ेगा। सरकार संकट का प्रभाव न्यून करने के लिए अपने आयात में विविधीकरण अपनाते हुए रूस, मोरक्को, जॉर्डन जैसे देशों की ओर जा सकती है। फॉस्फेट और पोटाश के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए निवेश आकर्षित करने के अलावा नैनो-यूरिया, बायो फर्टिलाइजर को बढ़ावा दे सकती है।

उर्वरक मिलना मुश्किल हो तो किसान कम उर्वरक वाली फसलों जैसे दालें, मोटे अनाज की बुआई ज्यादा कर सकते हैं। गेहूं, चावल जैसी मुख्य फसलों की उपज 5 से 10 प्रतिशत तक गिरी तो हमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और ब्राजील से दालों या तिलहन का आयात बढ़ाना पड़ेगा। यह स्थिति भारत को उर्वरक आत्मनिर्भरता की दिशा में गंभीरता से सोचने को बाध्य करेगी। यदि नीतिगत और निवेश संबंधी निर्णय तेजी से लिए जाएं, तो 5-7 वर्षों में भारत फॉस्फेट और पोटाश में आंशिक आत्मनिर्भरता हासिल कर सकता है।

खाड़ी देशों से ही आता है उर्वरक

हम सालाना लगभग 20 करोड़ टन उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके आदि शामिल है। हम यूरिया उत्पादन ठीक-ठाक मात्रा में करते हैं फिर भी अपनी जरूरत के उर्वरक का 40 फीसद बाहर से ही मंगाते हैं। फॉस्फेट और पोटाश के मामले में हमारी आयात निर्भरता 80 से 90 प्रतिशत तक है।

लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा

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