80th Independence Day Freedom Fighters: भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं प्रत्येक भारतवासी को हार्दिक बधाई देता हूं। साथ ही, मैं उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को सादर नमन करता हूं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। पिछले सप्ताह अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की अपनी यात्रा के दौरान मुझे हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत हमारे राष्ट्रीय ध्वज फहराने तथा महान देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा तिरंगा फहराए जाने की ऐतिहासिक स्मृति को नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
अंडमान स्थित राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल की मेरी यात्रा एक अन्य अत्यंत प्रेरणादायी रही। इसी जेल में भारत माता के महान सपूत वीर सावरकर, योगेंद्र शुक्ल, बटुकेश्वर दत्त, सचिंद्र नाथ सान्याल और अनेक अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को एकांत कारावास में रखा गया था। आज भी राष्ट्रीय स्मारक की ये दीवारें उन वीरों के साहस, उन्हें दी गई यातनाओं और सर्वोच्च बलिदान की गाथाएं सुनात्ती प्रतीत होती हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।
9 अगस्त को, जब हम भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति मना रहे थे, मुझे अंडमान द्वीप समूह में हर घर तिरंगा अभियान का शुभारंभ करने का अवसर प्राप्त हुआ। स्वतंत्रता सेनानी चाहे उत्तर में कश्मीर से हों या दक्षिण में तमिलनाडु से, पश्चिम में गुजरात से हों या पूर्व में असम से देश के सभी क्षेत्रों, वर्गों, आयु समूहों और लिंगों के लोगों ने भारत माता की स्वतंत्रता के साझा लक्ष्य के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अमर प्रतीक बनीं रानी लक्ष्मीबाई का शौर्य, मंगल पांडे का साहस और बाल गंगाधर तिलक का वह निर्भीक उद्घोष-स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा स्वतंत्रता की ओर बढ़ते राष्ट्र के प्रत्येक कदम को शक्ति प्रदान करता रहा।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की क्रांतिकारी भावना ने आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। असम की युवा वीरांगना कनकलता बरुआ जी भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करते हुए अपने हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ीं और अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।
भगवान बिरसा मुंडा जी तथा अनेक जनजातीय नेताओं ने भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक प्रतिरोध का नेतृत्व किया। इस स्वतंत्रता दिवस पर मैं तिरुप्पुर कुमारन को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, जिन्हें लोकप्रिय रूप से कोडी काथा कुमारन अर्थात ध्वज की रक्षा करने वाले कुमारन के नाम से जाना जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मेरे पैतृक स्थान तिरुप्पुर में उन्होंने आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। मृत्यु निकट जानते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को धरती पर नहीं गिरने दिया। इसी कारण उन्हें यह सम्मानजनक उपाधि मिली।
मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 27 वर्ष थी। जब मैं तिरुप्पुर कुमारन की आयु का उल्लेख करता हूं, तो मुझे उन अनेक युवाओं की याद आती है, जिन्होंने भारत माता के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए। इनमें भगत सिंह (23 वर्ष), सुखदेव (23 वर्ष), राजगुरु (22 वर्ष), खुदीराम बोस (18 वर्ष), कनकलता बरुआ (18 वर्ष), अनंत लक्ष्मण कान्हेरे (19 वर्ष), वंचिनाथन (25 वर्ष) और ऐसे अनेक युवा शामिल हैं।
मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस पहल की सराहना करता हूं, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन के उन गुमनाम नायकों को देश के सामने लाया जा रहा है, जिनका योगदान लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में अपेक्षाकृत अनदेखा रहा। मैं सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए, हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपने दायित्वों पर चिंतन करें और अपनी प्रतिबद्धता पुनः दृढ़ करें। इस अमृतकाल में 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के स्वयं को समर्पित करें और राष्ट्र की प्रगति तथा समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करें, यही उन वीर सपूतों के प्रति हमारी सबसे सच्ची और उचित श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अटूट साहस के साथ संघर्ष किया और हमारी स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण उत्सर्ग किए।
-लेख भारत उपराष्ट्रपति, सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा