हरतालिका तीज   (सौ.AI)
धर्म

Hartalika Teej : आखिर क्यों पड़ा ‘हरतालिका’ नाम? माता पार्वती की सखियों ने किया था उनका हरण, जानें पूरी कथा

Hartalika Teej Katha: हरतालिका तीज का सुहागिन महिलाओं में बड़ा महत्व रखता है। इस वर्ष हरतालिका तीज के दिन ही गणेश चतुर्थी का भी विशेष संयोग बन रहा है जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है।

सीमा कुमारी

Hartalika Teej Katha : भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज का सुहागिन महिलाओं में बड़ा महत्व रखता है। इस वर्ष हरतालिका तीज के दिन ही गणेश चतुर्थी का भी विशेष संयोग बन रहा है, क्योंकि 14 सितंबर को सुबह तृतीया तिथि के समाप्त होने के तुरंत बाद चतुर्थी तिथि का आरंभ हो रहा है। जिससे इस दिन का और भी बढ़ गया है।

इस व्रत के नाम को लेकर मन में एक सवाल आता है कि आखिर इसका नाम 'हरतालिका' ही क्यों रखा गया? आइए आपको बताते हैं इसके कारणों और इस नाम के मतलब के बारे में।

हरतालिका व्रत की शुरुआत कैसे हुई?

शिव पुराण के अनुसार हरतालिका व्रत की शुरुआत सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए की थी। इस व्रत और तपस्या को करने के लिए माता पार्वती की सखियां उनका हरण करके उन्हें वन में ले गई थीं, जिससे माता पार्वती बिना किसी बाधा के अपनी तपस्या करें। तभी से इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा।

हरतालिका शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'हरत' और 'आलिका'। जिसका अर्थ है हरत यानी 'हरण' और आलिका यानी 'सखी' है। इस प्रकार हरतालिका शब्द का अर्थ है 'सखियों द्वारा हरण करना'।

हरतालिका तीज व्रत कथा

कथा के अनुसार, पार्वती जी की सहेलियां उनका अपहरण करके उन्हें घने जंगल में ले गईं क्योंकि उस समय माता पार्वती के पिता उनकी इच्छा के विपरीत उनका विवाह विष्णु जी से करना चाहते थे।

उस समय माता पार्वती जी की सखियों ने उनका अपहरण कर उन्हें जंगल में छिपा दिया, जिससे माता पार्वती के पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विपरीत न कर पाएं। पार्वती जी शिव जी को मन ही मन अपना पति मान चुकी थीं।

इसलिए उनकी सखियों ने उनका साथ दिया और भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाकर भोलेनाथ की तपस्या की।

बताया जाता है कि, माता पार्वती ने इस पूरे समय के दौरान अन्न का त्याग भी कर दिया था और पूरे 17 साल सिर्फ कंदमूल खाकर ही तपस्या की।

पार्वती के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती को दर्शन देकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। उसी समय से यह व्रत अखंड सौभाग्य और अच्छे जीवनसाथी की कामना में महिलाओं और कुंवारी कन्याओं द्वारा रखा जाने लगा

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