बड़ बड़ुआ डाका फोटो.सोशल मीडिया
धर्म

Bada Badua Daka: दिवाली पर क्यों दी जाती है पूर्वजों को विदाई? जानिए ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ परंपरा

Bada Badua Daka Tradition : ओडिशा में दिवाली पर निभाई जाने वाली ‘बड़ बड़ुआ डाका’ परंपरा क्या है? जानिए कैसे लोग दीप और मशाल जलाकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उन्हें प्रतीकात्मक विदाई देते हैं।

सीमा कुमारी

Highlights:

  • ओडिशा में दिवाली पर ‘बड़ बड़ुआ डाका’ की खास परंपरा निभाई जाती है।

  • इस दिन लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं।

  • इस रस्म में जूट की सूखी डंडियों से मशाल जलाई जाती है।

  • जलती हुई मशाल को आसमान की ओर उठाकर पूर्वजों को विदाई दी जाती है।

  • यह परंपरा पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक है।

Ancestors Worship On Diwali : दिवाली का त्योहार देशभर में रोशनी, खुशियों और मां लक्ष्मी की पूजा के लिए जाना जाता है। लेकिन भारत के अलग-अलग राज्यों में दीपावली से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

इन्हीं में से एक खास परंपरा ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ है। इस परंपरा में दिवाली के अवसर पर अपने पूर्वजों को याद किया जाता है और उन्हें प्रतीकात्मक रूप से विदाई दी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर क्या है यह परंपरा और इसे मनाने के पीछे क्या मान्यता जुड़ी है।

क्या है ओडिशा की बड़ बड़ुआ डाका परंपरा?

ओडिशा में दिवाली के दिन ‘बड़ बड़ुआ डाका’ नाम की एक पारंपरिक रस्म निभाई जाती है। स्थानीय भाषा में ‘बड़’ का संबंध पूर्वजों या बुजुर्गों से और ‘बड़ुआ’ का अर्थ पितरों से जोड़ा जाता है। इस परंपरा के दौरान परिवार के लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हैं और उनके सम्मान में दीप जलाते हैं। इसे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका माना जाता है।

क्यों दी जाती है पूर्वजों को विदाई?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा है। ओडिशा में दीपावली के दिन भी पूर्वजों के सम्मान से जुड़ी यह रस्म निभाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों को उनके लोक की ओर विदा किया जाता है। यह विदाई किसी दुख या भय का प्रतीक नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा और अपने पुरखों के प्रति सम्मान का भाव है।

कैसे निभाई जाती है यह अनोखी रस्म?

इस परंपरा में लोग अपने घरों की छत, आंगन या ऊंचे स्थानों पर जूट की छोटी-छोटी मशालें जलाते हैं। इन्हें स्थानीय रूप से काऊंरिया काठी भी कहा जाता है। इसके बाद परिवार के सदस्य पारंपरिक तरीके से अपने पूर्वजों को याद करते हुए उन्हें रास्ता दिखाने और विदाई देने की प्रार्थना करते हैं। इस दौरान उड़िया भाषा में विशेष पुकार भी लगाई जाती है, जिसे ‘बड़ बड़ुआ डाका’ कहा जाता है।

क्या है इस परंपरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व?

बड़ बड़ुआ डाका केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपने परिवार, पूर्वजों और पुरानी मान्यताओं से जोड़ती है। इसके माध्यम से लोगों को यह संदेश मिलता है कि जीवन में अपने पुरखों के योगदान को याद रखना और उनका सम्मान करना महत्वपूर्ण है।

दिवाली की खुशियों के साथ जुड़ी है पूर्वजों की स्मृति

भारत में दिवाली अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है। ओडिशा की बड़ बड़ुआ डाका परंपरा इसी विविधता का सुंदर उदाहरण है। जहां एक ओर दीपावली पर घरों में दीप जलाकर खुशियों का स्वागत किया जाता है, वहीं दूसरी ओर इस परंपरा के जरिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का भाव भी व्यक्त किया जाता है।

यही भारतीय त्योहारों की खासियत है कि इनमें उत्सव के साथ परिवार और परंपराओं का जुड़ाव भी देखने को मिलता है।

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