वृंदावन टटिया स्थान रहस्य (सौ. सोशल मीडिया ) 
धर्म

वृंदावन का वो वन जो आज भी कलयुग से है अछूता, जहां द्वापर युग का दिखता है असर

Vrindavan Tatiya Sthan: वृंदावन की पावन भूमि में आज भी कई रहस्यमयी और आध्यात्मिक स्थान मौजूद है, जिनका विशेष महत्व है। ब्रज में स्थित टटिया स्थान आज भी इसका साक्षी है, जहां कलयुग प्रवेश नहीं कर सकता।

अपूर्वा नायक

Vrindavan Tatiya Sthan News: भगवान श्रीकृष्ण और ब्रज की राधारानी की पवित्र नगरी वृंदावन अपने कई भव्य और दिव्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। बदलती हुई दुनिया ने वृंदावन की तस्वीर को भी बदल दिया है। हालांकि आज भी इस धरती पर कई संतों की उपस्थिति इसे और भी ज्यादा पावन बना देती है।

मथुरा में स्थित वृंदावन में एक ऐसा भी मंदिर है, जहां जाकर आपको द्वापर युग का अनुभव होता है। कहा जाता है कि ये वो मंदिर है, जहां आज भी कलयुग प्रवेश नहीं कर सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि ये मंदिर आज भी केवल दियों की रोशनी से ही रोशन होता है।

क्या है इस मंदिर का रहस्य

वृंदावन में स्थित टटिया स्थान एक ऐसी गुप्त आध्यात्मिक जगह है, जहां आज भी कलयुग की एंट्री बैन मानी जाती है। इस मंदिर में आज भी द्वापर युग की परंपराओं का ही पालन होता है। वृंदावन परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले इस मंदिर में बिजली तक का उपयोग नहीं किया जाता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का भी इस मंदिर में उपयोग नहीं होता है। टटिया स्थान में मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच से लेकर इलेक्ट्रॉनिक चाबी तक को ले जाना वर्जित है।

टटिया स्थान से जुड़े कुछ अहम आकर्षण और नियम

इलेक्ट्रॉनिक्स बैन : टटिया स्थान पर मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच, बिजली और किसी भी प्रकार के कोई आधुनिक गैजेट का इस्तेमाल पूर्णत: वर्जित है। प्राकृतिक परिवेश: ये ब्रज की ऐसी भूमि है, जहां आज भी संत कुटिया बनाकर ही रहते हैं और पूरी तरीके से आधुनिकता की मोह माया से दूर रहकर भक्ति और भजन में लीन रहते हैं।

जानें क्या है इस मंदिर का पारंपारिक मान्यता?

टटिया स्थान से जुड़े भक्तों का मानना है कि भगवान कृष्ण के बाल रूप को बिजली की चकाचौंध से बचाने के लिए यहां आज भी इलेक्ट्रिसिटी का उपयोग बैन है। इस स्थान पर आज भी दिपकों की रोशनी से उजियारा होता है।

प्रेमानंद महाराज और टटिया स्थान का कनेक्शन

वृंदावन के रसिक संतों में से एक प्रेमानंद महाराज का भी इस जगह से पूरा नाता है। बताया जाता है कि अपने आरंभिक वृंदावन प्रवास के दौरान प्रेमानंद महाराजजी ने अपने गुरूदेव की पदचिन्हों पर चलकर टटिया स्थान के संतों की तरह ही ब्रज के कुंजों में निवास किया था।

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