King Parikshit (Source. Pinterest) 
धर्म

महाभारत का अनसुना रहस्य, इस एक गलती से राजा की मौत, आज के कलयुग से सीधा जुड़ा सच

Raja Parikshit Katha: Mahabharat में कई प्रसिद्ध कथाएं हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी घटनाएं हैं जो बेहद महत्वपूर्ण होने के बावजूद कम चर्चा में आई हैं। ऐसा ही एक किस्सा है राजा परीक्षित का जो खास है।

सिमरन सिंह

Mahabharat Story: महाभारत में कई प्रसिद्ध कथाएं हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी घटनाएं हैं जो बेहद महत्वपूर्ण होने के बावजूद कम चर्चा में आई हैं। ऐसा ही एक किस्सा है राजा परीक्षित की मृत्यु और कलयुग की शुरुआत का, जो आज के समय से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

श्रीकृष्ण के जाने के बाद बदला समय

जब पांडवों को यह ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण का धरती पर कार्य पूर्ण हो चुका है, तो वे अत्यंत दुखी हो गए। उन्होंने हस्तिनापुर का राजपाट अपने वंशज राजा परीक्षित को सौंप दिया और स्वयं हिमालय की ओर तपस्या के लिए चले गए। राजा परीक्षित एक पराक्रमी और न्यायप्रिय शासक थे। उनके शासन में प्रजा सुखी थी, लेकिन एक अदृश्य संकट धीरे-धीरे जन्म ले चुका था कलियुग का प्रवेश।

कलियुग का प्रभाव और धर्म की गिरती स्थिति

महाभारत युद्ध के दौरान ही द्वापर युग समाप्त हो चुका था और कलियुग का आगमन हो गया था। श्रीकृष्ण के रहते कलियुग अपना प्रभाव नहीं दिखा पाया, लेकिन उनके प्रस्थान के बाद यह मानव मन में नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ाने लगा। एक दिन राजा परीक्षित ने देखा कि एक व्यक्ति गाय और बैल को पीट रहा है। यह दृश्य प्रतीकात्मक था गाय पृथ्वी और बैल धर्म का प्रतीक थे। कलियुग में धर्म के चार स्तंभों में से केवल सत्य ही शेष रह गया था।

कलियुग से समझौता और उसकी चाल

राजा परीक्षित ने उस दुष्ट को पहचान लिया, जो वास्तव में कलियुग था। उन्होंने उसे दंड देने का प्रयास किया, लेकिन कलि ने बुद्धि का प्रयोग करते हुए कहा कि वह प्रकृति के नियमों का हिस्सा है। राजा ने उसे केवल चार स्थानों जुआघर, बूचड़खाने, वेश्यालय और मदिरालय में रहने की अनुमति दी। बाद में एक और स्थान के रूप में सोने में रहने की अनुमति भी दे दी गई। यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया, क्योंकि कलियुग ने राजा के सोने के मुकुट में स्थान बना लिया और धीरे-धीरे उनकी बुद्धि को प्रभावित करने लगा।

एक गलती और मिला श्राप

एक दिन शिकार के दौरान प्यासे और थके हुए राजा एक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि ध्यान में लीन थे और उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। कलियुग के प्रभाव में आकर राजा ने क्रोध में आकर एक मृत सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया। जब ऋषि के पुत्र को यह बात पता चली, तो उन्होंने श्राप दिया "सातवें दिन सर्पदंश से राजा की मृत्यु होगी।"

अंत और एक बड़ा संदेश

श्राप का ज्ञान होते ही राजा परीक्षित ने अपना राज्य पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और भगवान की कथा सुनने लगे। सातवें दिन तक्षक नाग ने आकर उनका अंत कर दिया।

आज के समय से क्या है संबंध?

यह कथा बताती है कि जब इंसान अपने विवेक पर नियंत्रण खो देता है, तो एक छोटी सी गलती भी बड़े विनाश का कारण बन सकती है। कलियुग आज भी उन्हीं जगहों पर फलता-फूलता है, जहां नकारात्मक प्रवृत्तियां होती हैं।

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