बंगाल में कोजागरी पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा और रात में जागने की परंपरा है।
ब्रज में शरद पूर्णिमा का संबंध श्रीकृष्ण की महारास लीला से है।
ओडिशा और मिथिला में इस पूर्णिमा से जुड़ी हैं अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराएं।
Kojagari Purnima Story: शरद पूर्णिमा की चांदनी का इंतजार सभी को होते है। चांद, मां लक्ष्मी की पूजा और श्रीकृष्ण की महारास लीला के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लेकर अलग-अलग परंपराएं और लोक कथाएं प्रचलित हैं?
कहीं इस रात मां लक्ष्मी के पृथ्वी पर आने की मान्यता है, तो कहीं अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी की कामना के साथ पूजा करती हैं। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा से जुड़ी चार दिलचस्प कथाएं और क्षेत्रीय परंपराएं।
पश्चिम बंगाल में शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है। यहां इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और रात भर जाग कर मां की आराधना की जाती है। इससे जुड़ी मान्यता में 'को जागर्ति?' यानी 'कौन जाग रहा है?' सवाल पूछे जाते हैं।
लोक विश्वास के अनुसार, मां लक्ष्मी रात में भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वालों पर कृपा बरसाती हैं। इसी मान्यता के कारण कई परिवार रात में पूजा-भजन करते हैं। घर के आंगन में अल्पना बनाई जाती है और देवी का स्वागत किया जाता है।
शरद पूर्णिमा से जुड़ी एक प्रचलित व्रत कथा में साहूकार की दो बेटियों का जिक्र मिलता है। कथा के अनुसार, दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, लेकिन बड़ी बेटी व्रत के नियमों का पूरी तरह पालन करती थी, जबकि छोटी बेटी ऐसा नहीं कर पाती थी।
विवाह के बाद छोटी बेटी को संतान से जुड़ी दुखों का सामना करना पड़ा। परेशान होकर उसने बड़ी बहन से इसका कारण पूछा। आगे की कथा अलग-अलग बताई गई है, लेकिन इनका मुख्य संदेश व्रत के प्रति श्रद्धा और नियम के पालन से जुड़ा है।
उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का विशेष संबंध श्रीकृष्ण की महारास लीला से है। शरद ऋतु की मनमोहक चांदनी की रात में श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ रास रचाया था। श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में रासलीला का वर्णन मिलता है।
इस परंपरा में रासलीला को केवल नृत्य के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण के रूप में देखा जाता है।
ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन अविवाहित लड़कियां सुबह सूर्य और शाम को चंद्रमा की पूजा करती हैं। इस पर्व का संबंध भगवान कार्तिकेय यानी कुमार से है। अच्छे जीवनसाथी और सुखी भविष्य की कामना के लिए इस व्रत को किया जाता है।
दूसरी ओर, बिहार के मिथिला क्षेत्र में कोजागरा की परंपरा का विशेष महत्व है। यहां नवविवाहित जोड़ों से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। कई परिवारों में दूल्हे के घर मखाना, पान और मिठाइयां भेजने की परंपरा है।