Narasimha Jayanti 2026 Vrat Katha: आज 30 अप्रैल को नृसिंह जयंती मनाई जा रही है। यह जयंती हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। धर्मग्रथों में बताया गया है कि, इसी तिथि पर प्रदोष काल में भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया था और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।
इसलिए यह शुभ तिथि सनातन धर्म में बड़ा महत्व रखता है। साथ ही यह दिन बुराई पर अच्छाई, धर्म की रक्षा, और भक्तों को सुरक्षा प्रदान करने की जीत का प्रतीक माना जाता है, जो भक्तों के भय व कष्टों का नाश करता है।
शास्त्रों के अनुसार, इस दिन विष्णु भक्त भगवान नरसिंह की पूजा अराधना करने के साथ कथा का पाठ भी करते है। बताया जाता है कि,भगवान नृसिंह के अवतार से जुड़ी कथा का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में दिति और ऋषि कश्यप के दो पुत्र हुए, जिनका नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप था। दोनों ही अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी दैत्य थे, जो अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों में आतंक फैलाते थे।
बताया जाता है कि हिरण्याक्षक ने अपने अभिमान में पृथ्वी को उठाकर रसातल में ले जाने का प्रयास किया, जिससे देवता भयभीत हो गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को पुनः स्थापित किया।
भाई की मृत्यु से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने मेरु पर्वत पर घोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त किया कि उसे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु, न दिन में, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर, न किसी अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु हो। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और स्वयं को भगवान मानने लगा तथा सभी से अपनी पूजा करवाने लगा।
इसी दौरान उसके घर भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ, जो बचपन से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कई बार समझाया और डराने का प्रयास किया, लेकिन प्रह्लाद ने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उन्हें मारने के अनेक प्रयास किए, पर हर बार वे भगवान की कृपा से बच गए। अंत में जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने का अंतिम प्रयास किया, तब प्रह्लाद ने पूरे मन से भगवान विष्णु को पुकारा। तभी एक खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह अवतार में प्रकट हुए—आधा मनुष्य और आधा सिंह रूप में। उन्होंने हिरण्यकश्यप को संध्या काल में, घर की दहलीज पर, अपनी गोद में रखकर अपने नाखूनों से उसका वध किया। इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मा जी के वरदान की सभी शर्तों को पूरा करते हुए अधर्म का अंत किया।
यह भी पढ़ें:-पति का इनकम नहीं बढ़ रहा? वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के नीचे चुपचाप कर लें ये उपाय, खुशहाली आएगी!
इसके बाद भगवान नृसिंह ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। मान्यता है कि इस घटना के बाद भगवान ने नृसिंह रूप में ही सभी भक्तों को आशीर्वाद दिया। नृसिंह जयंती पर व्रत रखने और पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, भय समाप्त होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।