Kajari Teej: कजरी तीज सिर्फ व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि लोक परंपरा, सावन की हरियाली और महिलाओं के उत्सव से जुड़ा हुआ त्योहार है। इस दिन कई जगह महिलाएं सजती-संवरती हैं, झूला झूलती हैं और अपनी क्षेत्रीय भाषा में गाई जाने वाली कजरी गीत गाती हैं। मायके से सिंधारा आना और मेहंदी लगाना जैसी परंपराएं भी तीज के सामाजिक स्वरूप को खास बनाती हैं।
कजरी तीज पर पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूला डालने की परंपरा भी वर्षों पुरानी है, जो आज भी निभाई जाती है। सावन-भाद्रपद के दौरान चारों ओर हरियाली और सुहावना मौसम इस परंपरा से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। महिलाएं और युवतियां झूला झूलते हुए गीत गाती हैं और एकृदूसरे के साथ उत्सव मनाती हैं। इस दिन मां पार्वती की आराधना की जाती है और पने लिए सौभाग्य मांगती है।
कजरी तीज की पहचान कजरी लोकगीतों से भी है। इन गीतों में सावन की फुहार, प्रेम, विरह और मायके की याद जैसी भावनाएं देखने को मिलती हैं। पहले महिलाएं समूह में झूला झूलते हुए इन गीतों को गाती थीं। इस तरह गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और महिलाओं की भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी रहे हैं।
तीज पर मायके से बेटी के लिए भेजे जाने वाले सिंधारा को स्नेह और शुभकामना का प्रतीक माना जाता है। इसमें साड़ी-कपड़े, श्रृंगार की चीजें, मेहंदी, चूड़ियां और मिठाई आदि शामिल होते हैं। यह परंपरा शादी के बाद भी बेटी और मायके के रिश्ते को मजबूत बनाए रखने से जुड़ी है। हालांकि सिंधारा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से मनाया जाता है। यह परंपरा बेटी को जीवन भर मायके से जोड़े रखती है और यह बताता है कि उसका स्थान आजीवन उसके मायके में बना रहेगा।
तीज के मौके पर मेहंदी लगाना महिलाओं के श्रृंगार का खास हिस्सा माना जाता है। कई तीज परंपराओं में महिलाएं हाथों पर मेहंदी रचाती हैं और हरी चूड़ियां पहनती हैं। इसे सुहाग और उत्सव से जोड़कर देखा जाता है। मेहंदी की खुशबू और रंग त्योहार के पारंपरिक माहौल को और खास बना देते हैं।
तीज के दौरान हरे रंग के कपड़ों और चूड़ियों का खास चलन देखने को मिलता है। हरा रंग सावन की हरियाली, प्रकृति, नई शुरुआत और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में हरे रंग को शिव-पार्वती से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से तीज के श्रृंगार में हरे रंग की साड़ी, लहंगा या सूट खूब पसंद किए जाते हैं।
तीज पर महिलाएं पारंपरिक रूप से सोलह श्रृंगार करके पूजा की तैयारी करती हैं। इसमें बिंदी, सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी, आभूषण और अन्य श्रृंगार सामग्री शामिल होती हैं। धार्मिक मान्यताओं में इसे सौभाग्य और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि से जोड़ा जाता है। कई परंपराओं में माता पार्वती को भी सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती है।
कजरी तीज का धार्मिक संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से माना जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या सफल हुई। इसी आस्था के कारण महिलाएं इस दिन व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।