Kanha Bhog : हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस बार भी भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव 4 सितंबर को मनाई जाएगी। ज्योतिषयों के अनुसार, इस बार 15 साल बाद जन्माष्टमी पर ऐसा विशेष संयोग बन रहा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में मनाया जाएगा। जिससे इस शुभ तिथि का महत्व और भी बढ़ गया है।
धार्मिक ग्रंथों में जन्माष्टमी व्रत की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ जन्माष्टमी का व्रत करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में जन्माष्टमी व्रत की महिमा बताते हुए इसके फल को बहुत बड़ा बताया गया है।
इसी आधार पर धार्मिक मान्यता है कि एक जन्माष्टमी का व्रत 20 करोड़ एकादशी व्रतों के समान फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, जन्माष्टमी का व्रत करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति भी होती है।
माखन-मिश्री कान्हा को सबसे अधिक प्रिय है। बचपन में मैया यशोदा उन्हें माखन-मिश्री खिलाती थीं और वे वृंदावन में गोपियों के यहाँ माखन की चोरी भी किया करते थे, इसीलिए उन्हें 'माखनचोर' भी कहा जाता है।
माखन-मिश्री के अलावा पंचामृत भी कान्हा को सबसे अधिक प्रिय है। पंचामृत पांच पवित्र चीजों से बनाई जाती है। इसमें दूध, दही, घी, शहद और शक्कर होता है। इससे स्नान भी कराया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पंचामृत से स्नान कराने से भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्त के जीवन में पवित्रता, समृद्धि और सौभाग्य आता है।
हिंदू धर्म शास्त्रों में तुलसी पौधे की पूजा का विधान है। अधिकतर लोग पूजा में तुलसी दल का इस्तेमाल करते हैं, भगवान श्रीकृष्ण को भी तुलसी बहुत प्रिय है। हर भोग, चाहे वह फल हो या मिष्ठान, उसमें तुलसी का पत्ता अवश्य अर्पित करना चाहिए। तुलसी दल अर्पित करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है और इससे भगवान का आशीर्वाद शीघ्र प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण को पीला रंग विशेष प्रिय है क्योंकि यह पवित्रता, ज्ञान और आनंद का प्रतीक है। पूजा के समय भगवान को पीले या रेशमी वस्त्र पहनाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण को तिलक के लिए चंदन और रोली का इस्तेमाल करते है। चंदन शीतलता और पवित्रता का प्रतीक है, जबकि रोली मंगल और सौभाग्य का।