मिथुन संक्रांति ( सौ.सोशल मीडिया) 
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रविवार को मिथुन संक्रांति, जानिए क्यों की जाती है सिलबट्टे की पूजा, पूजा का शुभ मुहूर्त भी जानिए

भारत एक ऐसा देश है जहां परंपराओं और रीति-रिवाजों का गहरा महत्व हैं। हर त्योहार और विशेष दिन का अपना एक अलग महत्व और मनाने का तरीका होता हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण दिन है मिथुन संक्रांति।

सीमा कुमारी

15 जून रविवार को मिथुन संक्रांति मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में मिथुन संक्रांति का विशेष महत्व होता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, जब सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को मिथुन संक्रांति कहा जाता है। यह संक्रांति हिंदू धर्म में एक पवित्र अवसर माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर के दान करते हैं।

भारत एक ऐसा देश है जहां परंपराओं और रीति-रिवाजों का गहरा महत्व हैं। हर त्योहार और विशेष दिन का अपना एक अलग महत्व और मनाने का तरीका होता हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण दिन है मिथुन संक्रांति।

आपको जानकारी के लिए बता दे कि, इस दिन कई तरह की परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनमें से एक खास परंपरा है सिलबट्टे यानी पत्थर का चक्की की पूजा करना। क्या आपने कभी सोचा है कि मिथुन संक्रांति के दिन सिलबट्टे की पूजा क्यों की जाती है, आइए जानते हैं इस बारे में -

क्या है मिथुन संक्रांति 2025 मुहूर्त

आपको बता दें, पंचांग के अनुसार, मिथुन संक्रांति आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी तिथि को है। 15 जून को सुबह 6 बजकर 53 मिनट पर सूर्य देव मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, उस क्षण ही मिथुन संक्रांति होगी। बता दें, मिथुन संक्रांति का महा पुण्य काल सुबह 6 बजकर 53 मिनट से सुबह 9 बजकर 12 मिनट तक है। इसका पुण्य काल सुबह 6 बजकर 53 मिनट से दोपहर 2 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस​ दिन का ब्रह्म मुहूर्त 04:03 ए एम से 04:43 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:54 ए एम से 12:50 पी एम तक है।

आखिर मिथुन संक्रांति पर सिलबट्टटे की पूजा क्यों करते हैं?

ज्योतिषयों के अनुसार, हर साल मिथुन संक्रांति के दिन सिलबट्टटे की पूजा करते हैं। उस दिन से लेकर अगले 4 दिनों तक सिलबट्टटे का उपयोग नहीं किया जाता है। उसे एक ही स्थान पर स्थिर रखा जाता है।

इस दिन सिलबट्टटे को भूमिदेवी यानि धरती माता का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि मिथुन संक्रांति के दिन से धरती माता रजस्वला रहती हैं। मिथुन संक्रांति से लेकर अगले चार दिनों तक यानि 15 जून से लेकर 18 जून तक धरती माता रजस्वला रहेंगी, इस वजह से सिलबट्टटे की पूजा की जाएगी और उसका घर के किसी कार्य में उपयोग नहीं होगा।

ज्योतिष बताते है कि, जिस प्रकार से सभी महिलाओं में मासिक धर्म होता है, वैसे ही धरती माता का मासिक धर्म मिथुन संक्रांति को होता है। मासिक धर्म के कारण मिथुन संक्रांति को रज संक्रांति भी कहते हैं। ये भी मान्यता है कि मिथुन संक्रांति से अगले 4 दिन तक धरती माता स्वयं को मानसून के लिए तैयार करती हैं ताकि अगली फसल अच्छी हो।

कैसे करते हैं सिलबट्टटे की पूजा

मिथुन संक्रांति के दिन सिलबट्टटे की पूजा करने से पूर्व साफ पानी और दूध से उसका अभिषेक करते है। इस प्रक्रिया को वसुमति गढ़वा कहा जाता है। उसके बाद अक्षत्, चंदन, सिंदूर, फूल, फल, धूप, दीप आदि से सिलबट्टटे की पूजा करते है।

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सिलबट्टटे की पूजा करने से मिलते है कई फायदे

सिलबट्टटे की पूजा करने से जातक को कई फायदे होते है। मिथुन संक्रांति पर सिलबट्टटे की पूजा विशेषकर महिलाएं करती है। यह पर्व महिलाओं से जुड़ा होता है। जिस महिला को संतान सुख प्राप्त नहीं है, उसे गंगा स्नान करने के बाद सिलबट्टटे की पूजाा करनी चाहिए। मान्यताओं के अनुसार सिलबट्टटे की पूजा करने से उनको संतान सुख प्राप्त हो सकता है। ऐसे ही जिस कन्या का विवाह नहीं हो रहा है या शादी में किसी प्रकार की बाधा आ रही है तो मिथुन संक्रांति पर उस कन्या को सिलबट्टटे की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। इससे शादी में आने वाली दिक्कतें दूर होंगी और अच्छे वर की प्राप्ति होती है।

मिथुन संक्रांति के लिए सूर्यदेव की पूजा का महत्व

सूर्य देव को आरोग्य का दाता भी माना जाता है। मिथुन संक्रांति पर उनकी पूजा करने से रोगों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति स्वस्थ रहता है। शास्त्रों के अनुसार, मिथुन संक्रांति पर किया गया स्नान, दान और जप सहस्त्रगुणा फल प्रदान करता है।

इसे 'पुण्यकाल' कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। साथ ही अगर किसी जातक को बार-बार रोगदोष संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तो इस दिन सूर्यदेव की पूजा विधिवत रूप से करें। इससे उत्तम परिणाम मिल सकते हैं।

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