धींगा गवर पूजा फोटो.सोशल मीडिया
धर्म

Dhinga Gavar Festival: रात में निकलती हैं सजी-धजी महिलाएं, हाथों में बेंत और चेहरे पर स्वांग

Dhinga Gavar: जोधपुर में मनाया जाने वाला धींगा गवर मेला अपनी अनोखी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। जानें 16 दिन की पूजा, महिलाओं के स्वांग, बेंत मारने की परंपरा, गवर माता और इस मेले से जुड़ी खास बातें।

रीता राय सागर

Dhinga Gavar Mela: राजस्थान के जोधपुर में मनाया जाने वाला धींगा गवर मेला अपनी अनोखी परंपराओं के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। इसे बेंतमार गवर या बेंतमार तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस मेले की खासियत यह है कि रात के समय शहर की सड़कों पर महिलाओं का दबदबा रहता है। इस पारंपरिक मेले के दौरान महिलाएं अलग-अलग रूप धारण कर हाथों में बेंत लेकर निकलती हैं और सामने आने वाले पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से बेंत मारती हैं।

क्या है धींगा गवर?

धींगा गवर को गवर माता का लोक रूप माना जाता है। गवर को देवी पार्वती का रूप माना जाता है। यह परंपरा जोधपुर के सांस्कृतिक धरोहर की पहचान है। गणगौर की तरह इसमें भी शिव-पार्वती से जुड़ी मान्यताएं हैं, लेकिन धींगा गवर में पूजा के साथ हास्य, स्वांग और लोक परंपराओं का अनोखा मेल दिखाई देता है।

16 दिनों तक चलती है पूजा

धींगा गवर की पूजा परंपरागत रूप से 16 दिनों तक चलती है। इस दौरान महिलाएं गवर माता की पूजा-अर्चना करती हैं और कई स्थानों पर व्रत तथा विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। सरकारी पर्यटन स्रोत के अनुसार पूजा का यह क्रम चातुर्मास से जुड़े पारंपरिक तिथि चक्र में 16 दिनों तक चलता है।

मेले की रात होती है सबसे खास

पूजा के अंतिम दिन रतजगा यानी महिलाएं रात भर जागती है। रात में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा और अलग-अलग स्वांग धारण करके जोधपुर के पुराने शहर की गलियों में निकलती हैं। उनके हाथों में बेंत या लकड़ी की छड़ी होती है और वे अलग-अलग स्थानों पर स्थापित गवर माता के दर्शन करती हैं।

महिलाएं क्यों करती हैं पुरुषों की बेंत से पिटाई?

इस परंपरा के पीछे कई लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार पुराने समय में महिलाएं पुरुषों को गवर माता के दर्शन से दूर रखने के लिए हाथों में डंडे लेकर चलती थीं। समय के साथ मान्यताएं बदली और कहा जाने लगा कि यदि अविवाहित युवक को बेंत लगती है, तो उसका विवाह जल्द हो जाता है।

इसी वजह से कुछ अविवाहित युवक भी इस रात जानबूझकर महिलाओं के सामने आने और बेंत खाने को शुभ मानते हैं।

महिलाओं के अलग-अलग स्वांग

धींगा गवर की रात महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनती हैं और अलग-अलग रूप धारण करती है, इनमें देवी-देवताओं के अलावा राजा-रानी, पुलिसकर्मी, डॉक्टर, साधु, व्यापारी और अन्य सामाजिक पात्र शामिल होते हैं। यही रंग-बिरंगे स्वांग इस आयोजन को बेहद आकर्षक बनाते हैं।

रात में महिलाओं का रहता है 'राज'

मेले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि रात के समय पुराने जोधपुर की गलियों में महिलाएं समूह में घूमती हैं, गीत गाती हैं और गवर माता के विभिन्न स्थानों पर जाकर दर्शन करती हैं। पुरुष आमतौर पर दर्शक की भूमिका में रहते हैं और परंपरा के अनुसार बेंत लगने को लेकर आपत्ति नहीं जताते।

11 स्थानों पर स्थापित होती हैं गवर माता की प्रतिमाएं

परंपरा के अनुसार पुराने जोधपुर शहर में धींगा गवर की प्रतिमाएं कई महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थापित की जाती हैं। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार पुराने शहर में 11 प्रमुख स्थानों पर गवर माता की स्थापना की परंपरा रही है। महिलाएं रात में इन स्थानों पर जाकर पूजा और दर्शन करती हैं।

गवर माता को पहनाए जाते हैं आभूषण

धींगा गवर की प्रतिमाओं को राजस्थानी परंपरा के अनुसार सजाया जाता है। कई प्रतिमाओं पर भारी मात्रा में सोने के आभूषण चढ़ाए जाने की परंपरा बताई जाती है। कुछ स्रोतों के अनुसार इन प्रतिमाओं पर 5 से 30 किलोग्राम तक सोने के आभूषण सजाए जाते हैं।

'मोई' का भी है विशेष महत्व

धींगा गवर की पूजा में मोई नामक प्रसाद का उल्लेख मिलता है। इसे सूखे मेवों और भांग के मिश्रण से तैयार किए जाते है। हालांकि प्रसाद से जुड़े स्थानीय रीति-रिवाज अलग-अलग समुदायों और स्थानों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।

शिव-पार्वती से जुड़ी है कथा

धींगा गवर की लोककथा भगवान शिव और देवी पार्वती से जुड़ी होती है। एक प्रचलित कथा के अनुसार भगवान शिव ने पार्वती के साथ मजाक करने के लिए अलग वेश धारण किया था। इसके जवाब में पार्वती ने भी अलग रूप धारण करके शिव के साथ हास-परिहास किया। इसी देवीय हास्य और स्वांग की परंपरा से धींगा गवर की शुरुआत हुई।

महिला शक्ति और लोक संस्कृति का अनोखा संगम

धींगा गवर केवल एक मेला नहीं, बल्कि जोधपुर की सदियों पुरानी लोक परंपराओं, धार्मिक आस्था, हास्य, स्वांग और महिला-केंद्रित संस्कृति का अनोखा मेल है। इस रात सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की भूमिका केंद्र में होती है और पारंपरिक सामाजिक भूमिका एक दिन के लिए पलट दी जाती है।

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