विनोद मेहरा (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
विनोद मेहरा और रेखा के रिश्ते की चर्चा आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल है। यासीर उस्मान की किताब 'रेखा: एन अनटोल्ड स्टोरी' के मुताबिक, दोनों ने कोलकाता में शादी की थी। हालांकि, विनोद के परिवार की नाराजगी के चलते उनका रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका। बताया जाता है कि विनोद की मां ने रेखा को स्वीकार नहीं किया और उन्हें घर छोड़कर जाना पड़ा। दोनों ने सार्वजनिक रूप से इस शादी की पुष्टि नहीं की थी।विनोद मेहरा की पहली शादी मीना ब्रोका से हुई थी। उस समय वह अपने फिल्मी करियर में तेजी से आगे बढ़ रहे थे। शादी के कुछ समय बाद विनोद को हार्ट अटैक आया, जिसके बाद उनकी निजी जिंदगी में परेशानियां बढ़ने लगीं। दोनों के रिश्ते में तनाव आया और आखिरकार 1978 में उनका तलाक हो गया। इस रिश्ते के टूटने के बाद विनोद की जिंदगी में अभिनेत्री बिंदिया गोस्वामी की नजदीकियां बढ़ने लगीं।विनोद मेहरा और बिंदिया गोस्वामी की नजदीकियां फिल्मों में साथ काम करने के दौरान बढ़ीं। दोनों ने कथित तौर पर गुपचुप शादी भी कर ली थी। हालांकि, इस रिश्ते को लेकर विवाद और पारिवारिक तनाव की खबरें सामने आईं। बताया जाता है कि पहली पत्नी के परिवार की नाराजगी के कारण बिंदिया काफी परेशान थीं। बाद में उन्होंने विनोद से रिश्ता तोड़ लिया और फिल्ममेकर जे.पी. दत्ता से शादी कर ली। इस तरह विनोद की एक और शादी टूट गई।लगातार रिश्तों में असफलता झेलने के बाद विनोद मेहरा ने 1988 में किरण से शादी की। किरण केन्या के एक ट्रांसपोर्ट कारोबारी की बेटी थीं। इस शादी के बाद विनोद की जिंदगी में खुशियां लौटीं और उनके घर बेटी सोनिया का जन्म हुआ। ऐसा लग रहा था कि अब उनकी निजी जिंदगी स्थिर हो गई है, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 30 अक्टूबर 1990 को हार्ट अटैक से विनोद मेहरा का निधन हो गया। उस समय वह महज 45 साल के थे।विनोद मेहरा के निधन के समय उनकी पत्नी किरण गर्भवती थीं। अभिनेता की मौत के करीब सात महीने बाद बेटे रोहन मेहरा का जन्म हुआ। उनकी बेटी सोनिया उस समय बहुत छोटी थीं। पति को खोने के बाद किरण बच्चों को लेकर केन्या लौट गईं और वहीं उनकी परवरिश की। बाद में दोनों बच्चों ने फिल्मों की दुनिया में कदम रखा। विनोद मेहरा के जाने के बाद भी उनका परिवार और उनकी फिल्मी विरासत चर्चा में बनी रही।विनोद मेहरा ने अपने करियर में करीब 100 फिल्मों में काम किया और दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। अभिनय के साथ उन्होंने निर्देशन और निर्माण में भी हाथ आजमाया। उनकी फिल्म 'गुरुदेव' उनके निधन के बाद 1993 में रिलीज हुई। इसके अलावा 'पत्थर के फूल', 'इंसानियत' और 'औरत औरत औरत' जैसी फिल्में भी उनकी मौत के बाद दर्शकों तक पहुंचीं।